“शब्द मेरे मीत”

शब्दों के कारीगर जुटे थे आज,
हर मन में सृजन का था आगाज़।
भावों की नदियाँ बह रहीं थीं उमंग में,
सपनों की गंध घुली थी हर रंग में।
किसी ने छेनी से तराशी व्यथा,
किसी ने हँसी की गढ़ी व्याख्या।
किसी के शब्दों में देशभक्ति का नाद,
किसी के गीतों में प्रेम का संवाद।
तालियों की गूंज थी नभ तक जाती,
हर पंक्ति नई रोशनी फैलाती।
कवि थे, कलाकार थे, रागिनी के साथी,
हर मुख पर झलक रही थी सौगातें स्नेहभरी।
श्रोता भी मगन, मन थे पावन,
शब्दों में डूबे, भूल गए जीवन का गहन।
ज्यों गंगा में स्नान हो भावों का,
मानो मिलन हुआ आत्मा का भावों का।
साहित्य सखा सब संग हुए,
मन के आकाश में चित्रित नवरंग हुए।
कवि, कविता, श्रोता, और मंच मिला,
शब्दों का मेला सच में बड़ा रंगीला।
स्वरचित धारा बहती रहे यूँ ही,
मन की मिट्टी में खुशबू घुली।
शब्द_मेरे_मीत बस यही तो पुकार,
डॉ. महिमा सिंह, आप हैं शब्दों की धार।
मन में छाए हर्ष अपार जब साहित्य सखा कहे यह पंक्तियां
जिनको सुनकर प्रेरित हो कलम मेरी
लिखने को फिर मैं हो जाती झट से तैयार।
‘डॉ. महिमा सिंह’




