विश्व रंगमंच दिवस पर कविता: हमने रंगमंच को क्या दिया ?


विश्व रंगमंच दिवस पर कविता
हमने रंगमंच को क्या दिया ?
मेरा पहला क़दम मंच का,
मैंने पहली बार जब किया
रुख़ अपना
रंगमंच की ओर
न थी समझ
न थी कोई गहराई
बस चल पड़ा था
कुछ करने और
अभिनेता बनने की
मन में थी ख्वाहिश
साल दर साल बीतते गए
करते गए नाटक दर नाटक तमाम सारी भावनाओं को
अभिव्यक्त करते
तमाम सारी चरित्रों को
मंच पर जीवंत करते
यूं ही चल रहा था
मंचीय सफर ।
कहीं टूटा- कहीं फूटा
कहीं अच्छा-कहीं बुरा
कहीं ताली-कहीं गाली
मिला प्यार भी आकार भी
मिला सब रंगमंच पर ।
चलना भी मंच पर सीखा बोलना भी मंच पर सीखा समझना भी रंगमंच से सीखा
जो भी सीखा सब रंगमंच से ।
लिखना-पढ़ना भी सीखाया
बोलना तर्क करना भी सीखाया
रंगमंच ने दुनिया के मंच तक पहुंचा ।
शेक्सपियर, चेखव, इबसन
के नाटक कराया,
टू बी नॉट टू बी की
पंक्तियों को गहराइयों में उतारा
सोफोक्लीज ने मर्म समझाया
स्टैनिस्लावस्की,एडलर, मेइसनर, चेखव की अभिनय तकनीकी का ज्ञान कराया
ख़ुद की ख़ुद से
पहचान कराया ।
दुनिया को समझाया
इंसानियत मोहब्बत
एकता का रंग भराया
युद्ध को- ज़ुल्म को
ग़लत कहने पर
मुखर बनाया।
इन्सान बनना
और रहने का
फ़र्क समझाया
जीवन
जीने की कला है
इसका अर्थ समझाया।
रंगमंच ने हमें सब कुछ दिया
हमने रंगमंच को क्या दिया ?
हमने रंगमंच को क्या दिया ?




