‘तेलंगाना सरकार की तरह सारे राज्यों को नफ़रती भाषण के ख़िलाफ़ क़ानून बनाना चाहिए’
Lucknow Focus News Desk: भारत में नफ़रत फैलाने वाले भाषण आज लोकतंत्र, सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों के सामने एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर समाज को बाँटने वाली बयानबाज़ी लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में तेलंगना सरकार द्वारा हेट स्पीच के विरुद्ध सख्त कानून लाने की पहल एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या देश के सभी राज्यों को भी तेलंगाना की तरह हेट स्पीच बिल बनाना चाहिए।
भारतीय संविधान का मूल आधार “एकता में विविधता” है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) यह भी स्पष्ट करता है कि यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। यदि कोई भाषण सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, राष्ट्र की एकता या किसी समुदाय की सुरक्षा को खतरे में डालता है, तो राज्य उस पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है। यही कारण है कि हेट स्पीच केवल “राय” नहीं बल्कि कई बार हिंसा, दंगे और सामाजिक विभाजन का कारण बन जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में देश ने ऐसे कई उदाहरण देखे हैं जहाँ भड़काऊ भाषणों के बाद सांप्रदायिक तनाव बढ़ा, इंटरनेट पर नफ़रत फैली और समाज के भीतर अविश्वास पैदा हुआ। सोशल मीडिया ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है, क्योंकि अब एक भड़काऊ वीडियो या बयान कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाता है। ऐसे में केवल भारतीय दंड संहिता की सामान्य धाराएँ पर्याप्त नहीं दिखतीं। एक स्पष्ट, आधुनिक और कठोर हेट स्पीच क़ानून समय की आवश्यकता बन चुका है।
तेलंगाना की पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संदेश देती है कि लोकतंत्र में स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति या संगठन धर्म, जाति या समुदाय के खिलाफ नफ़रत फैलाकर समाज को तोड़ने का प्रयास करता है, तो उसके विरुद्ध त्वरित और प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसा कानून केवल दंड देने के लिए नहीं बल्कि समाज में डर और विभाजन की राजनीति को रोकने के लिए भी आवश्यक है।
हालाँकि, किसी भी हेट स्पीच बिल को बनाते समय यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसका दुरुपयोग न हो। कानून इतना संतुलित होना चाहिए कि वह वास्तविक नफ़रत फैलाने वालों पर कार्रवाई करे, लेकिन सरकार की आलोचना, पत्रकारिता, व्यंग्य या वैचारिक असहमति को दबाने का हथियार न बन जाए। इसलिए कानून की भाषा स्पष्ट, परिभाषाएँ सटीक और न्यायिक निगरानी मजबूत होनी चाहिए।
भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में शांति और भाईचारा बनाए रखना केवल नैतिक आवश्यकता नहीं बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। जब नफ़रत की राजनीति समाज को तोड़ने लगे, तब कानून का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है। इसी दृष्टि से देखा जाए तो तेलंगाना की तरह सभी राज्यों को गंभीरता से हेट स्पीच बिल पर विचार करना चाहिए, ताकि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित न रहे बल्कि सामाजिक सद्भाव और समानता की भावना भी मजबूत हो सके।
नफ़रत से राष्ट्र कमजोर होता है, जबकि संवाद, संवेदना और भाईचारा लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। इसलिए आज आवश्यकता ऐसे भारत की है जहाँ विचारों का संघर्ष हो सकता है, लेकिन इंसानियत पर हमला नहीं।
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