विशेष

पेंशन : सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण अंग 

अफीफ सिद्दीकी (वरिष्ठ कर्मचारी नेता)

भारत देश में राज्य और केन्द्र सरकार के कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए पेंशन, उपादान, नगदीकरण,बीमा आदि कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने अथवा कर्मचारी की असामयिक मृत्यु हो जाने की स्थिति में उसके आश्रितों को प्रदान करने की महत्वपूर्ण व्यवस्था है। वर्ष 2004 में जनवरी माह से ऐसे कार्मिकों को पेंशन देने के लिए नेशनल पेंशन योजना लायी गयी है, जो राज्यों में अलग-अलग तिथि से लागू की गयी है। हम कह सकते हैं, कि 01जनवरी, 2004 से सेवा में आने वाले लोगों को प्रचलित पेंशन योजना का लाभ नहीं मिल सकेगा।

केन्द्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में 33 लाख कर्मचारी काम करते हैं। देश में 1 लाख लोगों पर 139 कर्मचारी हैं,जबकि अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र में यह आंकड़ा 668 सरकारी कर्मचारी का है। इस प्रकार कहा जा सकता है,कि एक विकासशील राष्ट्र से विकसित राष्ट्र बनने के लिए कम से कम अमेरिका में स्थापित नागरिक और कर्मचारी अनुपात को अंगीकृत करना होगा।

देश के नागरिकों को अधिक मानवीय सुविधा प्रदान करने  के लिए सरकारी रिक्त पदों को तत्काल भरने की आवश्यकता है। विभिन्न सरकारी आकड़ों के आधार पर देश मे राज्य और केन्द्र सरकार में 60.00 लाख से अधिक पद रिक्त हैं। हमारे संविधान की उद्देशिका का सार ‘‘हम भारत के लोग, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान करने का दृढ़ संकल्प लिया गया है।‘  वहीं इसके विपरीत देश में असंतुलन बढ़ रहा है। यह असंतुलन 1991 के बाद से नवउदारवादी नीतियों को पूंजीपति वर्ग को तुष्ट करने के पक्ष में लागू करने से आ रहा है। यह असंतुलन अभी तक अपने चरम पर है। आक्सफेम इण्डिया की रिपोर्ट-2023 ने चौंकाने वाले आंकड़े दिये हैं, जिससे यह निकल कर आया है,कि ग़रीब वर्ग अधिक कर दे रहा है। अमीरों को कर में रियायत दी जा रही है। इस कारण से देश में अमीर और अधिक अमीर होते जा रहे हैं। गरीबी बढ़ रही है।

आक्सफेम संस्था अपनी रिपोर्ट को ‘‘सर्वाइवल आफ द रिचेस्ट‘‘ से सम्बोधित कर रही है,रिपोर्ट बता रही है,कि भारत या दुनिया के बाकि हिस्सों में संसाधनों की कमी नहीं है। यह संसाधनों का असमान वितरण है। रिपोर्ट भयावह तथ्यों की ओर इशारा करने वाली है। देश के प्रत्येक नागरिक को, नागरिक समूहों के लिए काम करने वाले व्यक्तियों को इसका अध्ययन करने की आवश्यकता है। कैसे सरकार अमीरों पर ज्यादा मेहरबान है और गरीबों को सीमित दायरे में ला रही है। वस्तु एवं सेवा कर की शक्ल में कर का बोझ गरीब व मध्य वर्ग पर लादा जा रहा है और  देश में 146 नये बने अरबपतियों को कारपोरेट टैक्स में आशातीत छूट दी जा रही है। कारपोरेट वर्ग को 30 प्रतिशत कर से 22 प्रतिशत कर रोपित किया गया है। वहीं नयी कम्पनियां सिर्फ 15 प्रतिशत कारपोरेट टेक्स देकर काम कर सकती हैं।

हम फिर अपने विषय पर आते हैं,कि देश की अर्थव्यवस्था में इन्हीं सरकारी कर्मचारियों का महत्वपूर्ण योगदान है,जो मध्य वर्ग का प्रतिनिधत्व करते हैं। मध्य वर्ग का यह हिस्सा नियमानुसार और सबसे अधिक देश को आयकर,वस्तु एवं सेवा कर देता है। आज यह मध्यवर्ग अपनी सामाजिक सुरक्षा को लेकर अत्याधिक चिंतित है। सरकारी कर्मचारी परिभाषित पेंशन लाभ योजना जैसी महत्वपूर्ण मांग को पुनः स्थापित करने की लगातार मांग कर रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में नेशनल पेंशन योजना को हटाये जाने के लिए लगातार आंदोलन हो रहे हैं। प्रदेशों की सरकारें इस मुद्दे पर बिगड़ और बन रही हैं। राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में नेशनल पेंशन योजना को हटाकर परिभाषित लाभकारी पेंशन योजना देने की बात कही है और छत्तीसगढ़,पंजाब,हिमाचल प्रदेश,राजस्थान आदि राज्यों ने अध्यादेश लाकर इसे लागू किया है।

पेंशन का मुद्दा विशुद्ध राजनैतिक मुद्दा ही है। यह मुद्दा राजनीति से ही हल होगा। केन्द्र सरकार को इस पर पहल करने की आवश्यकता है,क्योंकि आज यह एक केन्द्रीय कानून के रूप में स्थापित हो चुका है। देश के सबसे बड़े राजनैतिक दल ने पुरानी पेंशन का लाभ देने को सिरे से नकार ही दिया है। तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने भाजपा के सहयोग से 06 दिसम्बर,2013 को नेशनल पेंशन स्कीम को लागू करने  और अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए पेंशन फंड डेवलपमेंट रेगूलेटरी आथारिटी (पीएफआरडीए) बिल सपा, बसपा, जदएस सहित विभिन्न क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर वामपंथी पार्टी के सांसदों के विरोध के बावजूद बहुमत से पारित कराया है। इस बिल के पारित होने के साथ ही नेशनल पेंशन स्कीम को लागू करने का स्थायी कानून बन गया है। त्रिपुरा,पश्चिम बंगाल और केरल राज्य को छोड़कर कर्मचारियों-शिक्षकों के भारी विरोध के बावजूद उत्तर प्रदेश की तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार ने 01अप्रैल,2005 से नियुक्त मुलाजिमों के लिए पुरानी पेंशन योजना समाप्त कर दी है। देश में विभिन्न राजनैतिक उतार-चढ़ाव के बीच सिर्फ पश्चिम बंगाल राज्य में पुरानी परिभाषित योजना लागू है और इसका दूसरा पक्ष यह भी है,कि वर्ष 2011 से तृणमूल सरकार के आने के बाद से राज्य में नियमित भर्तियां भी नहीं हो रही हैं। राज्य सरकार ने अपने कामकाज के लिए अन्य राज्यों की भांति आउटसोर्सिंग व्यवस्था को ही बढ़ावा दिया है। वर्ष 2002 के दौरान एनडीए सरकार द्वारा नियुक्त भट्टाचार्य समिति ने परिभाषित लाभ पेंशन योजना से परिभाषित अंशदायी पेंशन योजना पर स्वीच करने का सुझाव दिया और तत्कालीन एनडीए सरकार द्वारा 01जनवरी, 2004 से देश में लागू पेंशन योजना के कुप्रभाव अब सामने आ रहे हैं। देश भर के कर्मचारी और शिक्षक एक दशक से अधिक समय से आंदोलन कर रहे हैं और आधा,सहभागी पेंशन की कमियों को पहचाना है।

वर्ष 2004 के बाद से हुयी विभिन्न राष्ट्रीय हड़तालों व विरोध कार्यवाहियों ने इस नयी पेंशन प्रणाली के खिलाफ नारा बुंलद किया है । हालांकि,केन्द्र सरकार ने भागीदारी पेंशन प्रणाली को मजबूत करने के लिए कदम उठाए हैं। इसी के तहत सरकार ने अपनी भागीदारी पेंशन का हिस्सा 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 14 प्रतिशत कर दिया है। और कर्मचारी का अंशदान मूलवेतन व महंगाई भत्ता का 10 प्रतिशत है। अंशदान की गयी धनराशि पेंशन फंड रेगूलेटरी डेवलपमेंट आथारिटी (पीएफआरडीए) द्वारा अधिकृत भरोसेमंद वित्तीय संस्थानों को ट्रान्सफर की जाएगी। रिकार्ड रखने वाली एजेन्सी प्रत्येक कर्मचारी अलग से परमानेंट रिटायर मेंट एकाउंट नम्बर (पीआरएएन) रखेगी। रिटायरमेंट पर जमा हुयी कुल धनराशि की 60 प्रतिशत राशि पेंशनर्स को नगद,जिसमें 40 प्रतिशत कर मुक्त और 20 प्रतिशत कर युक्त दी जाएगी। शेष 40 प्रतिशत राशि को शेयर मार्केट में लगाया जाएगा। शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव के अनुसार पेंशन का निर्धारण होगा।

आंकड़े बताते हैं,कि उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के पास लगभग 800 करोड़ से अधिक की राशि कर्मचारियों -शिक्षकों के अंशदान की है,जिसका उपयोग किये जाने हेतु निर्णय लिया जाना है। एनपीएस ट्रस्ट का गठन पीएफआरडीए ने किया था,लेकिन सरकार ने एनपीएस ट्रस्ट को पीएफआरडीए से अलग करने के लिए कानून में संशोधन करने पर विचार कर रही है। पुरानी पेंशन योजना में व्यवस्था है,कि कार्मिक को अन्तिम दिया गया वेतन का 50 प्रतिशत धनराशि मासिक पेंशन के रूप् में निर्धारित है। इसके विपरीत नेशनल पेंशन योजना में किसी प्रकार की निश्चितिता नहीं है। सेवानिवृत्त हो रहे कर्मचारियों की सेवा वर्ष के आधार पर नेशनल पेंशन योजना के अंतर्गत अल्प धनराशि पेंशन के रूप में निर्धारित हो रही है । सरकारी कर्मचारियों के लिए परिभाषित लाभ पेंशन योजना लाभार्थियों से किसी भी जरूरी योगदान के बिना एक अच्छी तरह से निर्मित और सामाजिक सुरक्षा योजना में सर्वश्रेष्ठ है। परिभाषित लाभ पेंशन प्रणाली में दबी हुयी मजदूरी के रूप में लाभार्थियों कए लिए एक अंतर्निहित योगदान था। निजीकृत पेंशन योजना पर नवउदारवादी वैश्वीकरण का सबसे बड़ा आर्थिक दबाव है,जिसने पूरी दुनिया में श्रमिकों और कर्मचारियों को अपनी चपेट में ले लिया है। पेंशन सुधारों पर आईएमएफ-विश्व बैंक की नीति के बाद भारत सरकार ने तथाकथित नयी पेंशन योजना शुरू की है। नवउदार अर्थव्यवस्था प्रणाली की गहनता के मद्देनज़र आईएमएफ और विश्वबैंक के अधिकारियों ने पेंशन योजनाओं के निजीकरण के मामले को गंभीरता से लिया है।

बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था के साथ पेंशन फंड का पूर्व जुड़ाव निर्धारित किया और इस योजना को बिना किसी संरकारी नियत्रंण या हस्तक्षेप के स्वायत्तशासी सर्वाधिकार संस्था के द्वारा शेयर बाज़ार में लाभ और हानि पर पूरी तरह से निर्भर रहने के लिए मजबूर किया है।

देश लोकसभा चुनाव 2024 की तैयारी में है। कर्मचारी भी सरकार पर पूरा दबाव बनाने में जी जान से लगे हुए हैं। पुरानी पेंशन बहाली कृषि कानून की तरह केन्द्र सरकार के निर्णय पर संसद द्वारा वापस लिये जाने पर ही सम्भव हो सकेगी।

 

 

Related Articles

Back to top button