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पुण्यश्लोक: अहिल्याबाई की गाथा और हिंदी नाट्य परंपरा का पुनर्जागरण

Lucknow Focus News Desk: हिंदी नाट्य साहित्य के इतिहास में जहाँ आधुनिक संवेदनाएँ, संघर्ष और सामाजिक यथार्थ प्रमुख विषय रहे हैं, वहीं कुछ रचनाकारों ने इतिहास के गर्भ में छिपी गौरवगाथाओं को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर हिंदी नाट्य परंपरा को पुनर्जीवित किया है। इन्हीं में से एक सशक्त कृति है — अरुण शेखर का नाटक “पुण्यश्लोक – अहिल्याबाई की जीवन गाथा”, जो इतिहास, नारी-शक्ति और नाट्य-कला का अद्भुत संगम है।

यह नाटक केवल एक ऐतिहासिक चरित्र का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि एक युग की चेतना का पुनर्निर्माण है। लेखक ने अहिल्याबाई होल्कर के जीवन को उस दृष्टि से देखा है, जहाँ शासन, धर्म, न्याय और संवेदना एक साथ प्रवाहित होते हैं। नाटक में अहिल्याबाई को केवल एक आदर्श नारी या धर्मपरायण शासक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी दार्शनिक और दूरदर्शी व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया गया है, जिन्होंने जनसेवा, शिक्षा और न्याय को समान रूप से महत्व दिया।

‘पुण्यश्लोक’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह इतिहास को स्त्री-दृष्टि से पुनः परिभाषित करता है। अहिल्याबाई केवल पुरुष शासकों की परंपरा में फिट की गई नायिका नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी नारी हैं जिन्होंने संवेदना को शासन का केंद्र बनाया। आज जब समाज स्त्री सशक्तिकरण की नई व्याख्याएँ खोज रहा है, तब यह नाटक बताता है कि भारत की मिट्टी में ऐसी नारी-शक्ति सदा से विद्यमान रही है।

अरुण शेखर की भाषा सजीव, प्रभावशाली और काव्यात्मक है। संवादों में लय और गंभीरता दोनों हैं। उनके शब्द केवल संवाद नहीं, बल्कि विचारों की प्रतिध्वनि हैं। पात्रों के माध्यम से लेखक ने धर्म, न्याय, शासन और समाज के गहन संबंधों को उजागर किया है। नाटक का प्रवाह कहीं भी धीमा नहीं पड़ता; प्रत्येक दृश्य में दर्शक या पाठक की भावनाएँ जुड़ती चली जाती हैं।

यह नाटक हिंदी नाट्य परंपरा को केवल ऐतिहासिक पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा देता है। अरुण शेखर ने पं. एल. एन. पंत की नाट्य परंपरा से प्रेरणा लेकर इतिहास को नाट्य के माध्यम से जीवंत कर दिया है। इस कृति में भारतीय संस्कृति की अंतर्धारा प्रवाहित होती है, जो वर्तमान पीढ़ी को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ती है।

‘पुण्यश्लोक – अहिल्याबाई की जीवन गाथा’ एक ऐसी कृति है जो इतिहास, नारी-शक्ति और नाट्य-कला – तीनों को एक सूत्र में पिरोती है। यह नाटक पाठक के भीतर श्रद्धा, प्रेरणा और चिंतन के भावों को एक साथ जगाता है। अरुण शेखर का यह योगदान हिंदी रंगमंच और साहित्य दोनों के लिए नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करने वाला है।

लेखक : अरुण शेखर

समीक्षक : सुरजीत मान जलाईया सिंह

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