सत्ता ठुकराने वाले ‘बाबूजी’ कल्याण सिंह की राजनीति बनी मिसाल

Lucknow Focus News Desk: भारतीय राजनीति में सत्ता की कुर्सी से चिपके रहने वाले नेताओं की कमी नहीं, मगर कल्याण सिंह उन गिने-चुने चेहरों में रहे जिन्होंने विचार और संकल्प को कुर्सी से बड़ा माना। राम जन्मभूमि आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाने वाले कल्याण सिंह ने सत्ता, अदालत और जेल; हर मोर्चे पर जिम्मेदारी उठाकर राजनीति को नई परिभाषा दी। मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी तो बिना हिचक त्याग दिया, कारसेवकों पर गोली न चलाने का आदेश स्वीकार कर जेल गए और मंडल-मंदिर के बीच सामाजिक समीकरण गढ़कर भाजपा को नया जनाधार दिया।
राम जन्मभूमि आंदोलन में संकल्प को कुर्सी से बड़ा माना
राम जन्मभूमि आंदोलन में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा। अयोध्या के संत आज भी यह याद करते हुए कहते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद जब वे अयोध्या आए तो हेलिकॉप्टर का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। उन्होने सफ शब्दों में कहा था कि ‘अयोध्या की धरती पर सड़क मार्ग से आना ही मेरा सौभाग्य है।’ यह केवल यात्रा का अंदाज नहीं, बल्कि जनता से उनके गहरे जुड़ाव का प्रतीक था।
श्रीराम जन्मभूमि पर वर्षों तक सेवा देने वाले सेवानिवृत्त पुलिस अफसर पीके मिश्र का कहना है कि सभी यह जानते हैं कि 06 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिरने के बाद उन्होंने बिना कोई देर किये तत्काल इस्तीफा दे दिया था। सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर यह भी माना कि गोली न चलाने का आदेश उन्होंने ही दिया। उस दौर में जब नेता ठीकरा अधिकारियों पर फोड़ते थे, कल्याण सिंह ने जवाबदेही खुद उठाकर तिहाड़ जेल जाना स्वीकार किया।
त्याग, जवाबदेही और संतुलन से भारतीय राजनीति का लिखा अद्वितीय अध्याय
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक उनकी राजनीति का दूसरा चेहरा मंडल और मंदिर के बीच संतुलन साधने का था। मंडल फैसले से राजनीति जातीय खांचों में बंटी, तब उन्होंने पिछड़ों-दलितों को भाजपा से जोड़कर ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का नया अध्याय लिखा। इससे भाजपा का जनाधार व्यापक हुआ और वे हिंदुत्व के साथ सामाजिक समीकरणों के शिल्पकार भी बने।
वरिष्ठ पत्रकार पवन पाण्डेय बहुत खुश होकर यह बताते हैं कि यह बहुत ही आश्चर्य लगता है जब उनके शासन काल के बारे में कोई चर्चा करने का मौका मिलता है। मै तो अयोध्या का ही निवासी हूँ। थोड़ा सोचिये, जो व्यक्ति आठ बार विधायक, तीन बार मुख्यमंत्री, लोकसभा सांसद और राज्यपाल रहा उसका जीवन निष्कलंकित बीत गया। ये कहते हैं कि कल्याण सिंह की विरासत केवल पदों तक सीमित नहीं रही। सड़क से जुड़ाव, सत्ता त्याग का साहस, अदालत में जवाबदेही और सामाजिक संतुलन की कला ने उन्हें भारतीय राजनीति का अद्वितीय अध्याय बना दिया।
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