बचपन से एक मुलाक़ात !

Lucknow Focus News Desk: लखीमपुर-खीरी की मितौली तहसील का गांव-भगवतीपुर। मेरे बचपन की अनगिनत स्मृतियों का गवाह-भगवतीपुर। मेरी दोनों बुआ की ससुराल होने के चलते मेरे स्कूल में गर्मी की छुट्टियों का मेरा ठिकाना- भगवतीपुर। सन् 1975 से 1980 के दरम्यान मेरी विधवा मां, बहनें और मैं एक-डेढ़ महीने के लिए इसी गांव के मेहमान हो जाया करते थे। फिर वक्त के साथ सब पीछे छूटता चला गया। लगभग 35 साल बाद मोहम्मदी निवासी मेरे अतिप्रिय,पेशे से शिक्षक देवेश कुमार की सौजन्यता से भगवतीपुर जाने का सौभाग्य हाथ आया। अब भगवतीपुर में भले मेरा अपना कोई नहीं रहता, और बचपन के उस दौर में अपनों जैसा प्यार देने वाले कुछ लोग समय की मार के चलते मुझे पहचान न पाये हों, पर परिचय देने पर उन्होंने पलक-पांवड़े बिछा दिये। और फिर, उस दौर की न जाने कितनी यादों में हम सब देर तक डूबते-उतराते रहे।
मेरी बड़ी बुआ के घर से सटा भगवानदीन का परिवार हमारे लिए दूसरे घर जैसा हुआ करता था। बहुत साल पहले स्वर्गीय हो चुके भगवानदीन के परिवार में अब बुज़ुर्ग हो चुकी उनकी घरवाली हैं और उनके साथ है उनकी बहन का बेटा विनोद, जिसे उन्होंने बेऔलाद होने की वजह से, उसके बचपन में ही गोद ले लिया था। न तो मैं विनोद को, और न ही विनोद, मुझे पहचान सके,पर उनका नाम और यहां तक कि बचपन की उनकी छवि का आज भी स्मृति-लोप नहीं हुआ हैै। आखिर बचपन से उन्हें देखा-जाना जो था। बस परिचय देने की देर भर थी। अलबत्ता विनोद की पत्नी का मुझे पहचान लेने की बात कहना मुझे आश्चर्यचकित कर गया।
ऐसा ही एक परिवार मिश्री लाल का था जिनके घर में हमारा खूब आना-जाना होता था। मिश्री लाल अब इस दुनिया में नहीं हैं और उनकी पत्नी कमजोर आंखों के चलते मेरे बताने से पहले तक मुझे पहचान नहीं पायीं, पर उनके बेटे राकेश ने देखते ही मुझे पहचान लिया। विनोद के घर आवभगत के बीच अतीत से लेकर वर्तमान तक चली तमाम तरह की चर्चा के बाद विनोद की मौसी और पत्नी तथा राकेश की मां ने बड़े अपनेपन से फिर आने व वापस इसी रास्ते से जाने के निवेदन रूपी आग्रह के साथ हम दोनों को विदा किया।
देवेश कुमार के साथ की इस अविस्मरणीय यात्रा ने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचने में मदद की कि बचपन की स्मृतियां अमिट होती हैं और अतीत आनंददायी !
- सुशील सीतापुरी




