अथ श्री ‘थूक’ महात्म्य

‘थूक’ एक प्रकृति प्रदत्त पदार्थ है और थूकना मनुष्य प्रदत्त आदत। हर स्वस्थ शरीर में रक्त, मांस-मज्जा के साथ थूक का उत्पादन भी प्रचुर मात्रा में होता है। ये एक शाश्वत प्रक्रिया है, जो आजीवन चलती रहती है। थूक का उत्पादन मनुष्यों और पशुओं दोनों प्राणियों में समान रूप से होता है। लेकिन पक्षी समुदाय में अभी इसका पता नहीं चल सका है।वैसे भी किसी पक्षी को आज तक थूकते नहीं देखा गया। सृष्टि के आरम्भ से ही मनुष्य ने मल-मूत्र के साथ थूक को भी आत्मसात कर रखा है। जबकि उस दौर में मनुष्य कपड़ों तक को आत्मसात नहीं करता था।
इस तरह देखा जाए तो थूक प्राकृतिक के साथ ऐतिहासिक वस्तु भी है। किंतु दुख की बात है कि इसे समाज में सम्मानजनक नज़रों से नहीं देखा जाता। उल्टे सब इसके प्रति हिकारत का भाव रखते हैं। एक अजीब बात ये है कि अपना थूक तो सबको प्रिय होता है लेकिन दूसरे का फूटी आंख नहीं सुहाता। ऐसा नहीं है कि ‘थूक’ हर युग में या हर जगह उपेक्षित ही रहा है। अभी कुछ दशक पहले तक थूक को सम्मानपूर्वक एक बर्तन में रखा जाता था। पुराने लोग इस बर्तन को ‘उगालदान’ या ‘थूकदान’ के नाम से जानते हैं।
अभी ये तय नहीं हो सका है कि ‘लार गिरना’, ‘थूक कर चाटना’, ‘थू-थू करना’ या करवाना जैसे मुहावरे मनुष्यों की वजह से गढ़े गए या पशुओं की वजह से। खैर, उत्पादन भले पशुओं में भी होता हो लेकिन संसार में इसका सर्वाधिक वितरण मनुष्यों से ही होता है। कुछ लोग इसका वितरण किए बिना बात तक नहीं कर पाते। इनके सामने खड़ा व्यक्ति या तो बार-बार अपना चेहरा रूमाल से पोंछता रहता है या फिर सामने वाले के जोरदार झापड़ रसीद करने की तमन्ना करता है। हिसाब-किताब में साफ़-सुथरे लोग थूक का भी उधार नहीं रखते। तुरंत लौटा देते हैं।
मुहावरे की दृष्टि से ये प्रक्रिया ‘मुंह पर थूकना’ की श्रेणी में आती है। लेकिन मुहावरे में चूंकि मुंह पर पड़ने वाले छींटों की मात्रा तय नहीं की गयी है, इसलिए ये प्रक्रिया आज तक गुमनामी की जिंदगी जी रही है। इसे न तो समाज में कोई स्थान मिला और न यूनेस्को की सूची में जगह। ‘थूककर चाटना’ एक अन्य मुहावरा है। जिसे क्रियान्वित करने के लिए न तो भौतिक रूप से थूक की आवश्यकता होती है और न जुबान की। दुविधा ये है कि ‘थूककर चाटना’ मुहावरे में, चूंकि पदार्थ का स्वाद स्पष्ट नहीं है, इसलिए इसे स्वांत: सुखाय की श्रेणी में मान लिया गया है। काफी लोग पूरा जीवन इसी स्वांतः सुखाय में काट लेते हैं।
राजनीति में थूककर चाटने वालों का सबसे ज्यादा महत्व है। बल्कि यूं कहें कि केवल राजनीति ही ऐसा क्षेत्र है, जहां थूकने और फिर चाटने की पूरी आजादी है। कुछ नेतागण सिर्फ़ थू-थू करवाने में गौरव महसूस करते हैं तो कुछ आसमान पर थूकने की धृष्टता करते हैं। वो बात अलग है कि इस कोशिश में उनका थूका, न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम का पालन करते हुए, उन्ही के मुंह पर वापस गिरता है। वैसे राजनीति में थूकने और चाटने की असीम संभावनाएं हैं। पक्ष-विपक्ष के अनेक नेता इसका आदान-प्रदान करते रहते हैं।
यूपी और बिहार खैनी प्रधान प्रदेश हैं। खैनी और थूक का चोली-दामन का साथ है। खैनी को थूक फैक्ट्री का रा-मैटेरियल भी कहा जा सकता है। यदि मान लिया जाए कि इन दोनों सूबों में प्रतिदिन चार मीट्रिक टन खैनी की खपत है तो निश्चित मानिये कि थूक का उत्पादन भी इससे कम कतई नहीं होगा। यदि राष्ट्रीय औसत निकाला जाए तो मेरा दावा है कि यूपी और बिहार थूक उत्पादन में अग्रणी राज्यों में होंगे। लेकिन अफसोस कि तमाम खनिज संपदा की तरह ये संपदा भी समुचित योजनाओं के अभाव में बर्बाद हो रही है। सैकड़ों क्विंटल थूक चौराहों, गलियों, सरकारी कार्यालयों के कोनों, दीवारों, डस्टबिनों आदि में बर्बाद कर दिया जाता है।
हर व्यक्ति को कहीं भी थूकने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। मुझे उन राज्यों या विदेशी सरकारों से सख्त नफरत है, जो थूकने पर जुर्माना वसूल लेती हैं। यह प्राकृतिक संपदा का अपमान ही नहीं, हमारी बरसों पुरानी आदत का दमन भी है। लेकिन खुशी की बात है कि कानून बन जाने के बावजूद हर जगह थूकने की पूरी आजादी है। थूकने के लिए सबसे माकूल जगह सड़क मानी गई है… क्योंकि वह अपनी जागीर होती है। उसे तोडि़ये, खोदिये, अतिक्रमण कीजिए, थूक की नदियां बहा दीजिए, वह बेचारी चूं तक नहीं करती।
हां, सड़क पर थूकने वाले कभी- कभी गलतफहमियां अवश्य पैदा कर देते हैं। कुछ लोग इस डिजायन से थूकते हैं कि खड़े होकर देखने पर पांच रुपए का सिक्का लगता है। इस चक्कर में कुछ लोग अपने हाथ चुपचाप पैंट से पोंछते नजर आते हैं। मेरे एक पड़ोसी को थूकने के बाद कुछ देर निहारने की आदत थी। पता नहीं वह उसमें क्या तलाशते थे जो उन्हें पूरे जीवन नहीं मिला और एक दिन अचानक उसी थूक को निहारते- निहारते उनकी आत्मा उसी में समाहित हो गई।
एक बात और। लहू का रंग भले एक होता हो लेकिन थूक का नहीं। काल-परिस्थिति और आदतों के अनुसार यह बदलता रहता है। जैसे तंबाकू खाने वाले व्यक्ति से आप दूध जैसे उजले थूक की कल्पना नहीं कर सकते। इसी विधि से लाल, हरे, नीले, चितकबरे, सिल्की सिल्वर, मून लाइट, गोल्डन सिल्वर आदि रंगों का थूक देखकर आप उसके जनक के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं। गनीमत है कि भविष्यवक्ताओं तक अभी ये आइडिया नहीं पहुंचा है। वरना हर पैथोलाजी लैब में एक ज्योतिषी भी बैठा नजर आने लगता।
लार को थूक की छोटी बहन कहा जा सकता है, जो अक्सर दूसरे की समृद्धि देखकर चू जाती है। लेकिन, थूक की वजह से कई बार मुसीबत आते-आते बची है। कुछ साल पहले बिहार में छठ के आसपास एक नेता जी ने गंगा भ्रमण के दौरान उसमें थूक दिया। इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रियाएं आई। किसी ने थूक का बदला थूक से लेने की प्रतिज्ञा कर डाली। तो कोई नेता जी के थूक के कतरे गंगा जी से ढुंढवाकर उसका डीएनए टेस्ट करवाने पर अड़ गया। जिनकी समझ में कुछ नहीं आया। उन्होंने गंगा जी की ओर मुंह करके जोरदार प्रणाम किया और जोर से खंखारकर वहीं रेत पर थूक दिया। सब हुआ लेकिन बेचारी गंगा मैया के विचार जानने की कोशिश किसी ने नहीं की। थोड़ा कहे को ज्यादा समझिएगा। नो स्पिटिंग प्लीज!
‘कमल किशोर सक्सेना’




