विशेष
नीड़ कहाँ बनाऊँ (कविता)

(Illustration: Niharika Gaur)

चोंच में अपने तिनका लेकर
जगह – जगह वो उड़ने लगी
कहीं न कोई पेड़ मिला
थक – थक कर वो फिरने लगी
नीड़ मैं अपनी कहाँ बनाऊँ
घर परिवार कहाँ बसाऊँ
एक टहनी ढूँढ रही थी
बात ये उसने सबसे कही थी
कंक्रीट के जंगल में
ऊँची – ऊँची हवेलियाँ
कहाँ वो अपनी नीड़ बनाये
मन में उठी पहेलियाँ
तभी हवा का झोका आया
उसने उसको था समझाया
देखो इन मानव को देखो
पल-पल वृक्ष ये काट रहा
बिल्डिंग सड़के पुल बनाकर
कर जीवन से खिलवाड़ रहा
हम न रहेंगे तुम न रहोगी
ये भी न बच पायेगा
सूखा अकाल प्रलय प्रकोप
नित – नित शोर मचायेगा
विनाश काले विपरित बुद्धि
कौन इसे समझाये भला
यह वृक्ष जो तुमने काटा है
सबके जीवन का घाटा है
यही धरा का अनमोल है धन
स्वस्थ रहेगा इससे जीवन
अब भी समय है जाओ संभल
हरियाली की करो पहल
एक टहनी उसको मिले
नीड़ बने , संसार बसे
गौरैया बुलबुल तोता मैना
चहके तुम्हारे आँगन में
संग-संग में ही होता रंग
सह जीवन ही सुन्दर जीवन
समझ ले इतना तेरा मन
समझ ले इतना मेरा मन
-निहारिका गौड़

(-निहारिका गौड़ युवा कवयित्री, साहित्य समीक्षक और अध्यापिका हैं।)




