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पत्रकारिता के विविध आयाम

Lucknow Focus News Desk: प्राचीन काल में मानव के विकास के साथ ही परस्पर संवाद– सम्प्रेषण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी थी। जब तक मानव ने अक्षर– ज्ञान तथा निश्चित वर्णध्वनि सिद्धान्त का ज्ञान नहीं प्राप्त कर लिया तब तक वह विभिन्न प्रकार की ध्वनियों अथवा आवाजों के माध्यम से अपने मनोभावों को एक दूसरे से व्यक्त करता रहा। शनैः शनैः संवाद– सम्प्रेषण के रूप में परिवर्तन होने लगा तथा वाचिक रूप में संवाद– सम्प्रेषण मनुष्य के द्वारा किया जाने लगा । ऋग्वेद में उल्लिखित सरभा– पणि संवाद इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। उल्लेखनीय है कि लेखन कला के विकास ने वाचिक– सम्प्रेषण के स्थान पर लिखित– सम्प्रेषण को जन्म दिया तथा विविध प्रकार के संवादों को पत्र लेखन के माध्यम से प्रेषित किया जाने लगा।

संवाद – सम्प्रेषण मात्र व्यक्तिगत न होकर वैयक्तिक के साथ – साथ समष्टिपरक, राजनैतिक, धार्मिक तथा आर्थिक सभी प्रवृत्तियों को आवृत्त करता था। जो भी व्यक्ति इस प्रकार के कार्यों के लिए नियुक्त किये जाते थे वे विभिन्न भाषाओँ की जानकारी रखने वाले तथा अनेकानेक लिपियों के ज्ञाता होते थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ऐसे लोगों के लिए ‘आशुग्रंथश्चार्वक्षरो लेखवाचन समर्थाः लेखकाः’ का उल्लेख किया गया है। समसामयिक घटना को किस प्रकार राजा और जनता के बीच उपस्थित किया जाता था? इसका भी उल्लेख स्पष्ट रूप से अर्थशास्त्र में प्राप्त होता है।

प्रस्तुत सम्प्रेषण मात्र कथनोपकथन ही नहीं होता था बल्कि उसकी यथार्थता भी प्रमाणित होती थी। राजनीति, धर्मनीति, शासननीति सभी कुछ इससे प्रमाणित होता था। कथन की यथार्थता तो महत्वपूर्ण थी ही, संवाद को उपस्थित करने मे चाहे वो वाचिक हो या लिखित, इसमें संवाददाता को बहुत ही सावधानियां रखनी पड़ती थी । कल्हड ने अपनी पुस्तक राजतरंगिणी में इसका स्पष्ट उल्लेख किया है –

      श्लाध्यः स एव गुणवान् रागद्वेष विवर्जितः।

भूतार्थ कथने यस्य स्थास्यत्येव सरस्वती ।।

इसका स्पष्ट तात्पर्य है कि घटनाओं के वर्णन में रागद्वेष से परे होकर कार्य करना चाहिए। आधुनिक पत्रकारिता के लिए यह यक्ष प्रश्न है– क्या घटनाओं का सम्प्रेषण निष्पक्ष– भाव से किया जाता है? दुर्भाग्यवश आज लगभग सभी समाचार पत्र किसी न किसी राजनैतिक दल के हित पोषक के माध्यम बन चुके हैं। प्राचीन भारत में नारद की पत्रकारिता का संवाद– सम्प्रेषण-शैली यथार्थ कथन का अद्वितीय उदहारण प्रस्तुत करता है। यदि हम विचार करें तो संवाददाता का कार्य केवल यथार्थ के कथन तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह अपनी टिप्पणियों के माध्यम से सत्ता एवं समाज दोनो को दिशा निर्देश देने का कार्य भी करता है। इसलिए संवाददाता को इसका सम्यक ज्ञान होना चाहिए कि समष्टि हित साधन किसमें निहित है? महाभारत मे परिस्थिति, काल और स्थान के आधार पर धर्म के अधर्म होने तथा अधर्म के धर्म होने की चर्चा की गयी है –

     भवत्यधर्मों धर्मों हि धर्माधर्मवुभौअपि ।

कारणात्देश कालश्च देशकालाश्च तादृशः ।।

वृहस्पति स्मृति में भी यह उल्लेख प्राप्त होता है कि राज्य के कानून के साथ– साथ क्षेत्रीय रिति–रिवाजों एवं आचारों का सम्मान राजा के द्वारा किया जाना चाहिए। पत्रकारिता में इन सभी का ज्ञान, समय तथा काल के परिप्रेक्ष्य में इनकी उपयोगिता एवं अनुपयोगिता का विवेचन किया जाना चाहिए।

प्राचीन भारत में पत्रकारिता के अंग के रूप में पत्र– लेखन की सुदीर्घ– परम्परा प्रवाहित थी। बौद्ध जातकों में पत्र लेखन के विविध रूप देखे जा सकते हैं। कराहक जातक में व्यक्तिगत और अधिकारिक– पत्र, रुरु जातक में राजकीय घोषणाए इत्यादि इसके महत्वपूर्ण उदहारण हैं। इस प्रकार के पत्र–लेखन में किन – किन बातोँ का विशेष ध्यान रखा जाता था ? तथा इसका प्रभाव सत्ता पर किस सीमा तक पड़ता था ? पुराणों में वर्णित राजा वेन की कथा इस पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालती है ।

संवाद – सम्प्रेषण तथा राजनैतिक घटनाक्रम की जानकारी तथा विरोधी सत्ताओं के उत्कर्ष या अपकर्ष की प्रशंसा तथा निंदा केवल यथार्थ कथन के माध्यम से ही प्राचीन काल में नहीं की जाती थी, अपितु अप्रत्यक्ष रूप से भी की जाती थी– यथा कभी व्यंग के रूप में तो कभी प्राकृतिक वस्तुओं के आरोपण के रूप में। उदाहरणार्थ नैषधियचरितं में राजा ऋतुपर्ण के सन्दर्भ में श्री हर्ष का यह कथन कि गंगा की यशस्वी उज्ज्वलधारा में यमुना की अपकीर्ति रूपी श्यामलधारा समाहित हो गयी है। वस्तुतः श्री हर्ष के द्वारा कान्यकुब्ज नरेश की प्रशंसा तथा यमुना के किनारे दिल्ली में शासन करने वाले चौहान नरेशों की निंदा ही है। इस प्रकार की परंपरा आज के समाचार पत्रों में नियमित रूप से देखने को मिलती है। प्राचीन काल में राजकीय घोषणाएं, राजा के कार्यों का विवरण तथा संवाद को किस प्रकार तथा किन– किन माध्यमों से जनता के मध्य प्रचारित एवं प्रसारित किया जाता था, यह बिंदु पत्रकारिता के मूल मे देखा जा सकता है। सम्राट अशोक ने जन कल्याण के लिए जो भी कार्य किये उसे शिलाओं तथा स्तंभों पर लिखे अभिलेखों के माध्यम से जनता के बीच प्रचारित करवाया।

इस प्रकार भारत में भी पत्रकारिता का महत्व विद्यमान था। भुर्ज वृक्ष की छाल एवं ताडपत्र पर भी लिखकर सन्देश एवं राजकीय आज्ञाएँ जनता के बीच प्रचारित की जाती थीं। मेगास्थनीज ने इस बात का उल्लेख किया है कि भारत के निवासी कपास एवं ऊन की सहायता से लेखन की आधार सामग्री तैयार करते थे। इसकी पुस्तक ‘इंडिका’ में इसका स्पष्ट एवं विस्तृत उल्लेख प्राप्त होता है। इससे प्रमाणित हो जाता है कि प्राचीन भारत में कपडे पर भी लिखने की परंपरा विद्यमान थी जो आज भी देखा जा सकता है। कला के अनेक उदाहरणों के द्वारा भी घटनाओं को व्यक्त करने का माध्यम प्राचीन भारत के मानव की अपनी अद्भुत विशेषता ही कही जा सकती है। लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के रूप में आज पत्रकारिता एवं पत्रकार का अपना महत्वपूर्ण योगदान हो गया है। पत्रकारिता ही समाज एवं देश की राजनैतिक कुप्रवृत्तियों को नियंत्रित कर सद्मार्ग पर लाने का प्रयास कर सकती है जिसके लिए उत्कृष्ट, नैतिक, भयमुक्त तथा रागद्वेष से रहित पत्रकारिता होनी चाहिए।

प्रो. इन्दुभूषण द्विवेदी

अध्यक्ष – प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग,

के. बी. पी. जी. कॉलेज मीरजापुर

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