लखनवी रंगमंच पर छा गई ‘गंगा-जमुनी तहजीब’, संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से ‘चबूतरा थियेटर फेस्टिवल’ का शानदार समापन

Lucknow Focus News Desk: नवाबों के शहर लखनऊ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में आज एक और खूबसूरत अध्याय जुड़ गया। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से मदर सेवा संस्थान द्वारा आयोजित ‘चबूतरा थियेटर फेस्टिवल सीजन-10’ का गोमती नगर स्थित अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के सभागार में अत्यंत गरिमामयी और भव्यता के साथ समापन हुआ।
इस 10वें सीजन के समापन दिवस का मुख्य आकर्षण ज़े एफ चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से प्रस्तुत एकल नाटक ‘सारा जहां है हमारा’ रहा, जिसने सभागार में मौजूद कलाप्रेमियों और दर्शकों का दिल जीत लिया। इस मार्मिक नाटक का लेखन और अत्यंत कुशल निर्देशन लखनऊ की सुप्रसिद्ध रंगकर्मी किरन लता द्वारा किया गया।
गंगा-जमुनी तहजीब और ‘चन्दर’ के फौलादी हौसले की कहानी
नाटक ‘सारा जहां है हमारा’ लखनऊ की रूह कही जाने वाली ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के ताने-बाने पर आधारित एक बेहद मार्मिक और प्रेरणादायक प्रस्तुति है।
नाटक का ताना-बाना: नाटक की कहानी मुख्य पात्र ‘चन्दर’ के इर्द-गिर्द घूमती है, जो लखनऊ की तंग और ऐतिहासिक गलियों में पला-बढ़ा एक आम युवा है। गरीबी, तंगहाली और अभावों के तीखे थपेड़ों ने उसे वक्त-वक्त पर अंदर से झकझोरा, लेकिन वे उसके फौलादी आत्मविश्वास और सिद्धांतों को डिगा नहीं सके।
जीवन के हर मोड़ पर टूटकर बिखरने के बाद भी चन्दर हिम्मत नहीं हारता, बल्कि हर बार दोगुनी मजबूती के साथ उठ खड़ा होता है। समाज की कड़वी हकीकत और मतभेदों का सामना करते हुए भी वह अपनी इंसानियत और दूसरों की भलाई करने के जज्बे को कभी ओझल नहीं होने देता। यह नाटक आज के भटके हुए युवाओं को विपरीत परिस्थितियों में भी उम्मीद का दीया जलाए रखने और संघर्ष का दामन थामे रखने का एक सशक्त संदेश देता है।
महेश चंद्र देवा के जीवंत अभिनय से मंत्रमुग्ध हुए दर्शक
मंच पर एकल नाटक (Solo Play) करना किसी भी अभिनेता के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है, लेकिन मुख्य भूमिका में कलाकार महेश चंद्र देवा ने अपने सधे, परिपक्व और जीवंत अभिनय से पूरे सभागार को बांधे रखा।
उन्होंने अपने शानदार संवाद अदायगी और भाव-भंगिमाओं के जरिए दर्शकों को कभी हंसाया तो कभी उनकी आंखों को भावुक कर रुलाया। चन्दर के किरदार में उन्होंने समाज के अंतर्विरोधों और कड़वी सच्चाइयों को इतनी शिद्दत से उजागर किया कि पूरा सभागार काफी देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।
पर्दे के पीछे की टीम का उत्कृष्ट योगदान
इस एकल नाटक को भव्य और प्रभावशाली बनाने में पर्दे के पीछे (Backstage) काम करने वाले तकनीकी कलाकारों का विशेष योगदान रहा:
रंगदीपन (Light Design): मोहम्मद हफीज ने लाइटों के सटीक संयोजन से दृश्यों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को पर्दे पर उभारा।
संगीत निर्देशन (Music): आदित्य कुमार के कुशल संगीत निर्देशन ने नाटक के भावुक पलों को और अधिक मर्मस्पर्शी बना दिया।
रूपसज्जा (Make-up): कलाकारों को अवधी और लखनवी परिवेश में ढालने का खूबसूरत काम सहीर (Makeup Artist) द्वारा किया गया।
मंच संचालन व प्रस्तुति: इस पूरे कार्यक्रम की संपूर्ण प्रस्तुति हरीश चंद्र की रही, जबकि मंच का कुशल और प्रभावी संचालन राजेंद्र विश्वकर्मा “हरिहर” ने अपनी खास और चिरपरिचित शैली में किया।
नाटक के अंत में कार्यक्रम में शामिल हुए मुख्य अतिथियों, वरिष्ठ रंगकर्मियों और प्रबुद्ध दर्शकों ने पूरी टीम के इस सामूहिक और कलात्मक प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा की।




