कला दीर्घा: ‘छापा’ में दिखी जीवन की प्रतिध्वनि, कोकोरो आर्ट गैलरी में प्रख्यात छापाकार मनोहर लाल भुंगरा की रेट्रोस्पेक्टिव प्रदर्शनी शुरू

Lucknow Focus News Desk: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के कला जगत में इन दिनों छापाकला (प्रिंटमेकिंग) की अद्भुत गूंज सुनाई दे रही है। नगर स्थित कोकोरो आर्ट गैलरी में प्रख्यात छापाकार मनोहर लाल भुंगरा की कृतियों पर केंद्रित रेट्रोस्पेक्टिव प्रदर्शनी “छापा… जीवन की छाप (Imprint of a lifetime)” का भव्य शुभारंभ हुआ है। यह प्रदर्शनी केवल चित्रों का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय छापाकला की आधी सदी लंबी यात्रा का जीवंत दस्तावेज है।

परंपरा और आधुनिकता का अनूठा संगम
प्रदर्शनी का उद्घाटन वरिष्ठ छापाकलाकार जय कृष्ण अग्रवाल ने किया, जबकि इसका संयोजन प्रसिद्ध क्यूरेटर वंदना सहगल द्वारा किया गया है। कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ के पूर्व विभागाध्यक्ष मनोहर लाल भुंगरा की कला यात्रा 1960 के दशक से शुरू होकर समकालीन दौर तक फैली हुई है।

प्रदर्शनी की मुख्य विशेषताएं
51 मास्टरपीस: इस प्रदर्शनी में भुंगरा द्वारा निर्मित 51 चुनिंदा कृतियां प्रदर्शित की गई हैं।
विविध माध्यम: दर्शकों को लिथोग्राफी, एचिंग, लिनोकट, वुडकट, एंग्रेविंग और कोलाग्राफ जैसी जटिल तकनीकों का सूक्ष्म सौंदर्य देखने को मिलेगा।
सांस्कृतिक रूपांकन: उनकी कला में सर्प, पक्षी, नारी और मछली जैसे चिन्ह बार-बार उभरते हैं, जो भारतीय सांस्कृतिक स्मृति और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाते हैं।
त्रि-आयामी अनुभव: विशेष रूप से उनकी कोलाग्राफ कृतियाँ अपने उभार (एम्बॉसिंग) और बनावट के कारण एक अनोखा त्रि-आयामी (3D) अनुभव प्रदान करती हैं।
शांतिनिकेतन से लखनऊ तक का सफर
उद्घाटन अवसर पर जय कृष्ण अग्रवाल ने बताया कि भुंगरा जी ने 1971 में विदेश जाने के बजाय शांतिनिकेतन में सोमनाथ होर के निर्देशन में अध्ययन को प्राथमिकता दी। यह उनकी भारतीय कला परंपरा के प्रति अटूट निष्ठा का प्रमाण है। 35 वर्षों के शिक्षण जीवन में उन्होंने न केवल तकनीक सिखाई, बल्कि लखनऊ कला महाविद्यालय में छापाकला की एक पूरी पीढ़ी तैयार की।
छापाकला: मैट्रिक्स से कागज़ तक की यात्रा
क्यूरेटर वंदना सहगल के अनुसार, छापाकला की सबसे बड़ी खूबी इसकी ‘पुनरुत्पादन की क्षमता’ है। एक ही मैट्रिक्स (सांचे) से अनेक प्रतियाँ तैयार होने के बावजूद प्रत्येक प्रिंट अपनी सूक्ष्म भिन्नताओं के कारण अद्वितीय बना रहता है। यह माध्यम राजा रवि वर्मा की ओलियोग्राफी से लेकर मुंशी नवल किशोर प्रेस की परंपरा को समेटे हुए है।
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