ख़्वाबों का ताना-बाना: आत्मसंवाद की एक यात्रा

लेखक- रतन कुमार श्रीवास्तव ‘रतन’
जब आप किसी ऐसी किताब को पढ़ते हैं कि जिसे पढ़ते ही आप वह नहीं रह जाते हैं, जो आप पहले थे, तो यह किताब का ही जादू होता है। वह किताब आपके जेहन में इस तरह जज़्ब और पैबस्त हो जाती है कि आप उसी में डूबने-उतराने लगते हैं। लेखक की भावना आपकी अपनी लगने लगती है, उसमें और आप में एक साम्य स्थापित हो जाता है और आप आत्मसंवाद की यात्रा पर चल पड़ते हैं।… कुछ इसी तरह की किताब है ‘ख़्वाबों का ताना-बाना’, जो अपनी यात्रा में अपना जादू बिखेरती चलती है।
महाप्राण निराला ने जब ‘वह तोड़ती पत्थर’ से लेकर ‘अबे सुन बे गुलाब’ तक लिखकर हिन्दी काव्य में सरल संभावनाओं का द्वार खोला तो सातवीं शताब्दी में अरबी से चलकर फारसी और उर्दू तक का सफ़र करने वाली ग़ज़ल को दुष्यंत कुमार ने उसे हिन्दी के ताने-बाने में बुनकर हिन्दी साहित्य को ग़ज़ल विधा से समृद्ध कर दिया। यहाँ हिन्दी-उर्दू का भेद भी मिट गया। यहाँ उर्दू, जो आसानी से समझ में आ जाए, वह हिन्दी हो गई। इस संग्रह के शायर ने भी ऐसी ही हिन्दी का प्रयोग किया है। इसीलिए इस पुस्तक को शुभाशीष देते हुए देश की प्रसिद्ध साहित्यकार ममता कालिया जी कहती हैं कि, ‘एक बार फिर यह सत्य उजागर करता है कि उर्दू से चल कर हिन्दी में भी ग़ज़ल विधा की अच्छी पहुँच बन गई है।’
‘ख़्वाबों का ताना-बाना’ अपने शीर्षक की तरह ही बेहद प्रतीकात्मक और रहस्यपूर्ण है। ‘ख़्वाब’ जहाँ हमारे सपनों, उम्मीदों और भावनाओं का प्रतीक और उजाले का रूपक है, वहीं ‘ताना-बाना’ जीवन के जटिल अनुभवों, रिश्तों और संवेदनाओं की बुनावट को अभिव्यक्त करता है। यह जीवन की उलझनों, रिश्तों, अनुभवों एवं सम्भावनाओं का एक बिम्ब है। इस दृष्टि से पुस्तक का नाम ही, पुस्तक के मर्म को खोल देता है। यह नाम ही पूरी किताब का सार ख़ुद-ब-ख़ुद बयान कर देता है।
इस संग्रह के शायर श्री रतन कुमार श्रीवास्तव ‘रतन’ जी का मानना है कि जिस प्रकार धागा, बिना किसी रोक-टोक, बिना किसी ठोस रूप-रंग या आकार-प्रकार के कपड़े में ढलकर ही अपनी पहचान पाता है, उसी तरह ख़्वाब भी बिना रोक-टोक मन की बुनावट में आकार लेते हैं। अकेले धागे में न तो कोई रंग होता है, न ही कोई रूप; उसे कपड़े में ही जीवन मिलता है। ठीक वैसे ही, ख़्वाब भी अपने आने-जाने में किसी रंग या आकार को साथ नहीं लाते। वे बिना किसी बंधन के; सहज और स्वाभाविक रूप में, हमारी संवेदनाओं की जमीन पर पनपते हैं। यही कारण है कि ख़्वाब अधिक कोमल, अधिक आत्मीय और अधिक सच्चे प्रतीत होते हैं। शायद इसी वज़ह से ही शायर ने भी वर्षों से अनगिनत ताने-बाने बुनते हुए, असंख्य धागों को अपने मन में पिरोते हुए, उन्हें ‘ख़्वाबों का ताना-बाना’ नाम दिया है। इन धागों की बुनावट में सिर्फ़ उजाले नहीं, बल्कि अँधेरे भी हैं; सिर्फ रंग नहीं, बल्कि धूसरियाँ भी हैं। यही वज़ह है कि ख़्वाबों के ताने-बाने से बनी ग़ज़लों में एक ओर प्रेम और उम्मीद है, तो दूसरी ओर विरह और कसक भी, और सामाजिक विडम्बनाओं पर तीखा कटाक्ष भी। यह पुस्तक पाठक को महज़ शेरो-शायरी का आनंद ही नहीं देती, बल्कि भीतर उतरकर सोचने पर भी विवश करती है, मजबूर करती है।
‘ख़्वाबों का ताना-बाना’ ग़ज़लों का एक ऐसा संग्र्रह है, जिसमें जीवन के विविध अनुभव, संवेदनाएं और भावनाएं बारीक धागों की तरह पिरोई गई हैं। इस संग्रह की ग़ज़लें दिल को छूने वाली भावनाएँ हैं, दिल से उठी हुई सच्चाइयाँ हैं। ये हमारे समय, समाज और जीवन की गहरी हक़ीक़त को भी उजागर करती हैं। इस संग्रह की ग़ज़लों में कहीं प्रेम का मधुर स्पर्श है, तो कहीं जुदाई की कसक। कहीं प्रेम और विछोह की कोमल अनुभूति है, तो कहीं संघर्ष और टूटन की टसक। कहीं समाज की विडंबनाओं का तीखा एहसास है, तो कहीं जीवन की उम्मीद का उजाला। कहीं यह दिल की बेचैनियों का बयान है, तो कहीं समाज की विडंबनाओं पर तीखा कटाक्ष। इस प्रकार इस संग्रह की ग़ज़लें प्रेम, विरह, उम्मीद, टूटन, संघर्ष और सामाजिक सरोकारों का नुमायाँ करती हैं।
शैली और भाषा के लिहाज़ से रतन की ग़ज़लों में सहजता है, मगर भाव गहरे हैं। इस संग्रह की भाषा व्याकरणीय नहीं है। इसकी भाषा हृदय की भाषा है, जो हृदय से निकलकर हृदय की ओर प्रवाहित होती है। शेरों में शब्दों का चयन बेहद नपे-तुले अंदाज में किया गया है। शेर पढ़ते समय लगता है मानो अपनी ही धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही हो, मानो शायर ने हमारे ही दिल की बात कह दी हो। शायर रदीफ़-क़ाफ़िए की परंपरा का निर्वाह करते हुए भी प्रयोगधर्मी हैं। शायर ने आधुनिक बिम्बों के बेहतरीन प्रयोग किए हैं, जो ग़ज़लों को ताज़गी और अलग पहचान देते हैं। प्रयोगधर्मी होने के कारण यह संग्रह परंपरा और आधुनिकता, दोनों का सुंदर संगम है। सभी कठिन उर्दू शब्दों के हिन्दी अर्थ भी किताब में दिए गए हैं, जिससे पाठक का जुड़ाव बढ़ जाता है। इस ग़ज़ल-संग्रह में गजब का संतुलन स्थापित किया गया है- कथ्य का संतुलन, भाव का संतुलन, भाषा का संतुलन। ग़ज़लें न तो अत्यधिक दुरूह हैं और न ही केवल भावुकमय, इनमें जो संतुलन है, वह हर वर्ग के पाठक के लिए पठनीय है।
इस ग़ज़ल-संग्रह का साहित्यिक महत्व यह है कि ये ग़ज़लें-साहित्य की परंपरा में एक नई कड़ी जोड़ती हैं। इन ग़ज़लों में जहाँ परंपरा का सौंदर्य है, वहीं इनमें आधुनिकता की छाप भी साफ दिखाई देती है। रतन की ग़ज़लेंपाठक को महज़ शायरी का ही लुत्फ़ नहीं देती, बल्कि उन्हें आनंद की अतिरेख तक ले जाती हैं। यह संग्रह केवल पढ़ने का मज़मून नहीं, बल्कि आत्मसंवाद का माध्यम है। ग़ज़लों में छुपी संवेदनाएं पाठक को अपनी निजी अनुभूतियों से जोड़ लेती हैं। ‘ख़्वाबों का ताना-बाना’ समकालीन ग़ज़ल साहित्य में एक उल्लेखनीय योगदान है, क्योंकि इसमें परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम है। ‘ख़्वाबों का ताना-बाना’ ग़ज़ल-संग्रह, ग़ज़ल-प्रेमियों के लिए एक उपहार है। यह पुस्तक न केवल शायरी का मज़ा देती है, बल्कि पाठक के भीतर के ख़्वाबों और यादों को भी उद्विग्न कर देती है। यह ग़ज़ल संग्र्रह साहित्यिक जगत में अपनी एक नई पहचान और जगह बनाने की क्षमता रखता है। मेरा पूरा विश्वास है कि यह संग्रह ग़ज़ल-प्रेमियों के लिए एक अनमोल धरोहर साबित होगा।
इस संग्रह को पढ़ने पर दो चीज़ें मिलती हैं-एक सच्चा शायर और एक सच्ची शायरी। शायर अपने बारे में कहता है कि, ‘तपा हूँ कई बार मैं ज़माने की आग में, जा के तब अब कहीं कुछ निखरा हूँ मैं।’ और लेखक को अपने पाठकों पर इतना विश्वास है कि वह पाठकों से कहता है कि, “जानता हूँ, इक जादू है आपकी नज़रों में, देख लेंगे मुझे तो, मैं और निखर जाऊँगा’। इस विश्वास का संतुलन आपको इस पूरे ग़ज़ल-संग्र्रह में देखने को मिलेगा। इतनी सच्ची शायरी कि ‘थोड़ा ग़म, थोड़ी ख़ुशी हो। कुछ इसी तरह जिं़दगी हो।’ और ‘इक बार हमको बस ये बता दीजिए, प्यार कितना है हमसे, जता दीजिए।’ शायर कभी तो दुनियावी फरेबों से दूर जाना चाहता है तो कभी स्वयं पर भरोसा करने की बात करता है-‘चलो भाग चलें फ़िरक़ापरस्त इस दुनिया से, हो अगर तुम तैयार तो इक बार कह दो।’ आगे वह समाधान भी बताता है-‘अपने चराग़ पे बस भरोसा कर, बाहर न देख, कितनी तीरगी है।’ और इसी के साथ जीवन की यर्थाथता का साक्षात्कार भी कराता है ‘माटी के पुतले पर गुमान है तुम्हें, जाके कभी ज़रा श्मशान देखिए।’
वाणी जैसे देश के प्रतिष्ठित प्रकाशन से छपी इस प्रयोगधर्मी और सच्ची शायरी से लबरेज इस ग़ज़ल-संग्रह का ग़ज़ल-प्रेमियों द्वारा अभूतपूर्व स्वागत हो रहा है। अपने लोकार्पण के दूसरे माह में ही इसका द्वितीय संस्करण आना, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। मैं आश्वस्त हूँ कि यह ग़ज़ल-संग्रह हिन्दी साहित्य जगत में अपना अभीष्ट स्थान प्राप्त करेगी। वर्ष 2021 के शुरुआती दिनों में ही इनकी पहली किताब ‘ख़्वाबों में जिं़दगी मुस्कुराती रही’ (ग़ज़ल-संग्रह) प्रकाशित हुई थी, जो अमेज़न की बेस्ट सेलर रैंकिंग में रही है। यह किताब भी उसी दिशा की ओर बढ़ रही है, जो इस बात का प्रतीक है कि शायर में बहुत ऊर्जा है, और पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने की कला भी उनमें निहित है। निःसंदेह निकट भविष्य में लेखक की आगामी कृतियों से हिन्दी साहित्य और समृद्ध होगा। मैं लेखक और उनकी रचनाधर्मिता को अपनी शुभकामनाएँ अर्पित करते हुए, इतनी सुंदर किताब लिखने के लिए उन्हें साधूवाद देता हूँ।
समीक्षक- सुशील चन्द श्रीवास्तव




