पुण्यतिथि पर विशेष: ‘एक अविस्मरणीय व्यक्तित्व पं. ज्ञान चन्द्र द्विवेदी
मौजूदा स्वार्थपरक एवं मूल्यहीन राजनैतिक दौर में सैद्धान्तिक और संवेदनशील राजनीति के पर्याय

Lucknow Focus News Desk: एक विद्वान विधिवेत्ता, संसदीय प्रक्रिया के मर्मज्ञ, जुझारू जन प्रतिनिधि, ‘नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के सजग प्रहरी, अध्यापकों, अधिवक्ताओं और श्रमिकों के अपने प्रतिनिधि, जनतन्त्र के चतुर्थ स्तम्भ पत्रकारों के सहज उपलब्ध साथी और जन सामान्य के ज्वलंत मुद्दांे के प्रति ईमानदारी के संघर्षरत एक लोक सेवक तथा मौलिक शैली के निपुण वक्ता, सौम्य-मृदुभाषी, सहज और सरल व्यक्तित्व के धनी ‘पं. ज्ञान चन्द्र जी’ सचमुच एक परिपूर्ण बहुआयामी व्यक्तित्व थे।
सफल वकालत के साथ-साथ सक्रिय राजनीति का आपसी समन्वय व सन्तुलन प्रायः बिरले ही देखने को मिलता है। किन्तु राजनेता ज्ञान चन्द्र जी ने 32 वर्ष ख्याति प्राप्त वकालत के बीच ही आखिरी साँस ली। चतुर्दिक प्रतिभा के धनी इस अध्येता से राजनेता के व्यक्तित्व का समूचा स्वरूप ही अनूठा और प्रेरक रहा। उनका कहना था कि ‘‘राजनीतिज्ञ वही सफल है जिसने जीवनयापन के लिए पृथक कार्य क्षेत्र चुना हो, तभी साध्य व साधन की पवित्रता बनी रह सकेगी।’’
उच्च न्यायालय के सीनियर एडवोकेट तथा उ0प्र0 बार काउंसिल के अध्यक्ष और कालान्तर में आजीवन बार काउंसिल के सदस्य के रूप में जहाँ श्रीयुत द्विवेदी ने न्यायायिक आदर्शो को उच्चतम आयाम दिया।
वहीं जन प्रतिनिधि के रूप में संसदीय आदर्शों को प्रधानता दी। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के अपने समूचे कार्यकाल में संसदीय प्रक्रियाओं की विशेषज्ञता के चलते विभिन्न विषयों पर पूर्ण अधिकार और स्वाध्याय की अनूठी प्रवृत्ति के कारण आपने अपने ही दल में नहीं अपितु अन्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के बीच अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था। उनका विधायी कार्यों में ठोस व सक्रिय योगदान सतत रहा, सदन में अनेक मौलिक प्रश्नों तथा विषयों को उठा कर संसदीय आदर्शों और परम्पराओं को शीर्षता प्रदान की।
ज्ञान चन्द्र द्विवेदी राजनीतिक रूप से भारतीय जनसंघ व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सक्रिय रूप से जुड़े रहे। 1984 में वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से द्विवेदी ने क्षेत्र के स्नातक बौद्धिक मतदाताओं का विधान परिषद में गौरवशाली प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 1990 में वे पुर्ननिर्वाचित हुये।
द्विवेदी भारतीय जनता पार्टी की अत्यन्त महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राष्ट्रीय कार्य समिति के स्थायी सदस्य बनाये गये।वे उ0प्र0 भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष तथा विधान परिषद में दल के नेता थे। ‘उ0्रप. अधिवक्ता विधायक मंच’ के महामंत्री रहे। श्री द्विवेदी उ0प्र0 विधान परिषद की महत्वपूर्ण समिति ‘वित्तीय एवं प्रशासकीय विलम्ब समिति’ तथा ‘‘संसदीय एवं सामाजिक सद्भाव समिति के चेयरमैन भी रहे। काशी विद्यापीठ वाराणसी, सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी एवं अन्य कई संस्थाओं की कार्य समिति से प्रत्यक्षतया जुड़े रहे।
द्विवेदी ने अनेक पुस्तकें भी लिखी। उनके द्वारा लिखी पुस्तकों में ‘‘आपातकाल में नागरिक अधिकार एवं ‘‘माध्यमिक शिक्षा अधिनियम’’ उल्लेखनीय हैं।
ख्याति प्राप्त कानूनविद् सफल राजनीतिज्ञ, प्रखर पत्रकार और लेखक द्विवेदी के असामयिक निधन से राजनैतिक क्षेत्र की दुर्लभ विनम्रता, मर्यादा शालीनता तथा लोक मंगल की उदात्त परम्परा क्षीण प्राय हो गई। स्व0 द्विवेदी की लोक संग्राहक राजप्रवृत्ति सदैव उन्हें एक परिपूर्ण गरिमा से ओतप्रोत करती रही। राष्ट्र चेतना से समाहित उनके प्रत्येक कार्य सामाजिकता के कीर्ति स्तम्भ हैं। राजनीतिक मर्यादाओं को कायम रखने वाले विरले राजनीतिज्ञों में ही एक थे, स्व0 ज्ञान चन्द्र जी।
सामाजिक विधायी, शैक्षिक राजनीतिक, सांस्कृतिक और पत्रकारिता की असीम क्षमताओं के आधार पर प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय क्षितिज पर अपने व्यक्तित्व को मानव जीवन के हर क्षेत्र में प्रकाशित और प्रतिष्ठित करने वाले पं0 ज्ञान चन्द्र जी की 10 मार्च, 2011 को पुण्य तिथि है।
प्रयाग स्थित उनके निवास में विधि, संसदीय प्रक्रिया, संस्कृत, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा की साहित्यिक व सामाजिक प्रसंगों से जुड़ी हजारों पुस्तके ज्ञान चन्द्र जी के रूझान की परिचायक हैं। विधि क्षेत्र से सम्बंधित देश-प्रदेश के नवीनतम प्रकाशित जर्नल्स तो नियमित रूप से उनके पुस्तकालय में आते थे।
दैनिक अमृत प्रभात ने अपने सम्पादकीय में सर्वथा सत्य ही लिखा कि ‘‘एक सामान्य वकील और प्रेस सवंाददाता के स्तर से उठ कर एक बड़े नेता तथा वरिष्ठ अधिवक्ता तक की उनकी यात्रा किसी ने छिपी नहीं लेकिन एक बड़ी हैसियत पा लेने के बावजूद उनमें अहं नहीं था। उसी पुराने भाव और सम्मान के साथ वे लोगों से मिलते थे। एक सच्चे मित्र, अभिभावक तथा नेता के गुण उनमें बड़ी ही सहजता से घुले मिले थे।
6 जुलाई, 1932 को ग्राम समहन जनपद इलाहाबाद में जन्मे ज्ञान चन्द्र जी को उच्च नैतिक मूल्य, विद्वता, सौम्यता और निर्भयता अपने पिता पं0 सरयू प्रसाद द्विवेदी से विरासत में प्राप्त हुई थी। जो वहीं पर अध्यापक थे। ज्ञान चन्द्र जी की प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा मिर्जापुर में हुई। हाईस्कूल परीक्षा में आपका पूरे जनपद में सर्वप्रथम स्थान रहा।
1949-50 में द्विवेदी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के आयुर्वेदिक कालेज में ए0एम0एस0 के छात्र रहे किन्तु विषम पारिवारिक परिस्थितियों वश आपको अध्ययन बीच में ही छोड़ देना पड़ा। आपने बी0ए0 की परीक्षा जौनपुर से तथा एम0ए0 की परीक्षा ज्ञानपुर (वाराणसी) से अध्यापक के रूप में दी 1951 से 1955 तक श्री द्विवेदी मिर्जापुर में अध्यापनरत रहे।
लखनऊ विश्वविद्यालय से आपने कानून की परीक्षा में सर्व प्रथम स्थान प्राप्त किया। संवैधानिक विधि के प्रश्न पत्र में आपको 98 प्रतिशत अंक मिले यह लखनऊ विश्वविद्यालय का ऐसा कीर्तिमान हैं जो आज तक नहीं टूटा है। ‘‘कम्पनी ला’’ में आपको स्वर्ण पदक भी मिला।
श्री द्विवेदी ने विधिजगत में मूर्धन्य एवं तत्कालीन महाधिवक्ता पंडित कन्हैया लाल मिश्र के संरक्षण में वकालत का प्रशिक्षण लिया।
5 दिसम्बर, 1961 को स्व0 पं. मिश्र जी, जो उस समय बार काउंसिल उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष भी थे, ने अपने कर कमलों से ज्ञानचन्द्र द्विवेदी को अधिवक्ता का ‘‘गाउन पहनाया अधिवक्ता परीक्षा में आपको प्रदेश में सर्वोच्च स्थान मिला। ‘‘भारतीय मजदूर संघ ’’ उ0प्र0 के 10 वर्षों तक लगातार प्रदेश-अध्यक्ष रहे। ‘‘पूर्वोत्तर रेलवे श्रमिक संघ’’ के अनेक वर्षों तक अध्यक्ष रहे।
जनतन्त्र के चतुर्थ स्तम्भ पत्रकारों के कल्याण हेतु द्विवेदी सतत प्रयत्नशील रहे।
वाराणसी से प्रकाशित दैनिक ‘‘गाण्डीव’’ के सम्पादक के विरूद्ध जब आपातकाल में सेन्सर ने कार्यवाही की और उन्हें कैद कर दिया गया तब द्विवेदी ने प्रभावी पैरवी की और उन्हें मुक्त कराया। पांचजन्य’’ का प्रकाशन उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश से रद्द कर दिया था। श्री द्विवेदी ने उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में याचिका दाखिल कर स्थगन आदेश प्राप्त किया।
तत्कालीन राज्य सरकार ने वर्ष 1990 में न्यायालय के आदेशों की धज्जी उड़ाते हुये प्रदेश के कई प्रमुख समाचार पत्रों दैनिक ‘‘आज’’ और ‘‘दैनिक जागरण’’ के प्रकाशन व वितरण में व्यवधान उत्पन्न कर दिया तो द्विवेदी ने उच्च न्यायालय से स्टे आदेश प्राप्त कर उक्त समाचार पत्रों के निर्वाध प्रकाशन व वितरण को पूर्ववत सुलभ बनाया। विधान परिषद में कार्य स्थगन प्रस्ताव के जरिए पत्रकारों के उत्पीड़न पर चर्चा की।
स्व0 ज्ञान चन्द्र द्विवेदी स्वयं भी तेजस्वी पत्रकार थे। ‘‘आज’’ गाण्डीव’’ स्वतंत्र भारत’’ ‘‘पाइनियर’’, ‘‘जनसत्ता’’ तथा यू0एन0आई0 के आप मिर्जापुर में जिला संवाददाता रहे, विभिन्न राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में अपने विधि एवं संसदीय तथा सामाजिक पहलुओं पर अनेक लेख लिखे।
विधानपरिषद के अपने प्रथम कार्यकाल के समय से ही द्विवेदी ने प्रदेश के अधिवक्ता समुदाय के कल्याण के निमित्त ‘‘प्राविडेन्ट फंड योजना’’ को प्रारम्भ कराने का जो संकल्प लिया था 14 अप्रैल, 1989 के ‘‘अधिवक्ता भविष्यनिधि कानून’’ की रचना के रूप में इसे लागू कराने में अन्ततः सफलता मिल गयी।
उत्तर प्रदेश विधान मण्डल के 96 अधिवक्ता सदस्यों को संगठित करके द्विवेदी ने ‘‘अधिवक्ता विधायक मंच’’ की स्थापना की और भविष्यनिधि योजना को लागू करवाने में इन सदस्यों का भी प्रभाव प्रयुक्त किया।
शिक्षकों और कर्मचारियों को बोनस दिलाने, प्रदेश के हजारों तदर्थ शिक्षकों एवं कर्मचारियों की सेवायें विनियमित कराने हेतु वे जारे-शोर से प्रयत्नशील रहे और अन्ततः सरकार को उन्हें विनियमित करना पड़ा।
प्रदेश में संस्कृत विश्वविद्यालय के अध्यापकों के प्रति श्री द्विवेदी प्रथम जन प्रतिनिधि थे, जिन्होंने वास्तविक रूप से संघर्ष किया। संस्कृत विद्यालय के अध्यापकों को वेतन वितरण अधिनियम के अन्तर्गत लाने के लिए ‘‘उ0प्र0 विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक 1986’’ प्रस्तुत किया।
द्विवेदी मानवाधिकारों के सजग प्रहरी थे। आपातकाल में आपने मीसा बंदियों की निःशुल्क याचिकाएं दाखिल कीं। पांच सदस्यीय न्यायपीठ से विजय प्राप्त की। मीसा बंदियों से आप देश और प्रदेश के अनेक जेलों में जाकर मिले और उनका मनोबल बढ़ाया। द्विवेदी ने डा0 मुरली मनोहर जोशी जी के नेतृत्व में श्रीनगर में गणतंत्र दिवस के दिन लालचैक में आतंकवादियों की धमकियो ंको नज़र अंदाज कर झंडारोहण में उ0प्र0 का नेतृत्व किया।
विधान-परिषद सदस्य के रूप में द्विवेदी ने ‘‘उ0प्र0 दण्ड प्रक्रिया संशोधन विधेयक 1988 प्रस्तुत किया। जिसके उद्देश्य व कारणों में आपने इस बात का उल्लेख किया कि सम्पूर्ण भारत में अग्रिम जनमात कानून लागू है। परन्तु आपातकाल में उ0प्र0 के नागरिकों से अग्रिम जमानत का अधिकार वापस ले लिया गया। द्विवेदी द्वारा प्रदेश वासियों को इस कानून की सुविधा बहाल किये जाने हेतु विधेयक प्रस्तुत किया गया।
सरकार के इशारे पर आपातकाल में श्री द्विवेदी को जब पुलिस वालों ने तंग किया तब रात्रि में 11 बजे उन्होंने मुख्य न्यायमूर्ति का दरवाजा खटखटाया और तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति कुंवर बहादुर अस्थाना ने उन्हें अग्रिम जमानत दी। उच्च न्यायालय द्वारा रात्रि में बिना सरकार को नोटिस दिए ही द्विवेदी की अग्रिम जमानत देने पर उत्तर प्रदेश सरकार इतनी कुपित हुई कि उसने प्रदेश से अग्रिम जमानत का प्रावधान उसी समय समाप्त कर दिया।
द्विवेदी ने छल-कपट और प्रलोभनों द्वारा धर्मान्तरण समाप्ति हेतु उ0प्र0 विधान परिषद के 1989 के बजट सत्र से ‘‘उ0प्र0 धर्म स्वातंत्रय विधेयक 1989 प्रस्तुत किया।
द्विवेदी विगत कई वर्षों से ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के कार्यकारी सभापति रहे। द्विवेदी सांस्कृतिक एकता और जागृति भारतीय भाषाओं की उन्नति, राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक उत्थान के लिए सतत् प्रयत्नशील रहे।
वर्ष 1978-79 में आप भारत सरकार की ‘हिन्दी विधि साहित्य मूल्यांकन समिति’’ के सदस्य रहे। आपने सक्रियता का परिचय देकर हिन्दी के विधि साहित्य प्रकाशन को प्रेरणा दिलाने के लिए 10 हजार व 5 हजार रूपये के दो पुरस्कार रखवाए।
विधान परिषद के सदस्य के पूरे कार्यकाल में प्राप्त भत्ते, वेतन व अन्य सुविधाओं का प्रयोग वे संबंधित क्षेत्र में ही कर देते थे। वाराणसी स्नातक खण्ड निर्वाचन के 6 जनपदों के मतदाताओं के ही नहीं अपितु देश प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से रोज प्राप्त सैकड़ों पत्रों को वे अपनी व्यस्तता के बावजूद समय निकाल कर स्वयं पढ़ते ही नहीं थे बल्कि प्रत्येक पत्र का प्रत्युत्तर लिखवाने का कार्य भी उसी दिन पूर्ण करा देते थे।
उस महान व्यक्तित्व के सानिध्य में अविस्मरणीय विगत पन्द्रह साल इस लेखक की अमूल्य थाती हैं। यह थाती सदैव अन्तः स्थल व मानसिक पटल पर सदा-सदा संरक्षित और संजोई रहेगी। 10 मार्च 93 को महाकाल ने इस बहुआयामी व्यक्तित्व के जीवन पर पूर्ण विराम जरूर लगा दिया। किन्तु उनके सिद्धान्तों और समाज के लिए किये गये अप्रतिम योगदान और विलक्षण महान कार्यों पर कोई विराम कभी नहीं लगेगा यही हमारा संकल्प होगा।




