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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ‘बंधुआ मजदूरी पर रोक सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रह सकती’

Lucknow Focus News Desk: सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने बंधुआ मजदूरी के मामलों पर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि संविधान प्रदत्त ‘बंधुआ मजदूरी पर रोक’ का प्रावधान केवल कागजों पर लिखी बात बनकर नहीं रह सकता। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मजदूरों को शोषण से मुक्त कराना ही सरकार की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती, बल्कि उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने के लिए समय पर आर्थिक सहायता और पुनर्वास देना भी उतना ही जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार को दिए गए प्रमुख निर्देश

  • सात दिनों के भीतर आर्थिक मदद: अदालत ने निर्देश दिया है कि बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए व्यक्ति को रिहाई प्रमाण पत्र (Release Certificate) मिलने के बाद आमतौर पर सात दिनों के भीतर तत्काल वित्तीय सहायता मिल जानी चाहिए। केवल इस वजह से मदद नहीं रोकी जा सकती कि मामले की जांच या आपराधिक मुकदमा अभी चल रहा है।

  • पूरे देश में एक समान SOP: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को छह महीने के भीतर देश भर में एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करने का आदेश दिया है। इसके तहत शिकायतों का सत्यापन 24 घंटे के भीतर करने और जल्द बचाव अभियान चलाने की बात कही गई है। साथ ही एक समान रिहाई प्रमाण पत्र का प्रारूप भी तय होगा।

  • सुरेंद्र मांझी के मामले का हवाला: अदालत ने याचिकाकर्ता सुरेंद्र मांझी का उदाहरण दिया, जिन्हें 2019 में मुक्त कराया गया था लेकिन आर्थिक सहायता 2022 यानी तीन साल बाद मिली। उनके साथ के 17 अन्य मजदूरों को भी लंबे समय तक मदद नहीं मिलने पर अदालत ने चिंता जताई।

  • पुनर्वास योजना में बदलाव के लिए 3 महीने: केंद्र को पुनर्वास योजना में प्रस्तावित बदलावों (जैसे सहायता राशि बढ़ाना, प्रक्रिया आसान करना और अंतरिम जीवन-यापन सहायता देना) पर 3 महीने के भीतर फैसला लेने को कहा गया है।

अदालत ने कहा कि यदि समय पर सहायता न मिले तो मजदूर दोबारा शोषण के जाल में फंस सकते हैं। इस मामले की अगली सुनवाई अब सात महीने बाद तय की गई है।

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