“सुनो मैं प्रेमचंद” श्रृंखला का 1931वां दिन संपन्न, मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘चोरी’ के जरिए सामाजिक पूर्वाग्रहों पर कड़ा प्रहार

Lucknow Focus News Desk: उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जन्मस्थली लमही एक बार फिर उनकी कालजयी कहानियों के विचारों से गुंजायमान हो उठी। वाराणसी के लमही स्थित प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र ट्रस्ट द्वारा आयोजित अत्यंत लोकप्रिय साप्ताहिक साहित्यिक कार्यक्रम “सुनो मैं प्रेमचंद” श्रृंखला का 1931वां दिवस गौरवमयी ढंग से संपन्न हुआ। इस विशेष साहित्यिक संगोष्ठी में स्थानीय साहित्यप्रेमियों, बुद्धिजीवियों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने बड़े उत्साह के साथ भाग लिया।
कार्यक्रम की गरिमामयी शुरुआत उपस्थित अतिथियों और साहित्यकारों द्वारा मुंशी प्रेमचंद की भव्य प्रतिमा पर माल्यार्पण और भावभीनी पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके उपरांत, मुंशी जी की मशहूर कहानी ‘चोरी’ का सस्वर पाठन नंदलाल राजभर द्वारा किया गया, जिसने वहां मौजूद हर श्रोता को भाव-विभोर कर दिया।

कहानी पाठन के उपरांत मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक अवदान और सामाजिक संवेदना पर एक गहन परिचर्चा का आयोजन हुआ। मुख्य वक्ता प्रो. श्रद्धानंद जी ने प्रेमचंद की दृष्टि को नमन करते हुए कहा “मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘चोरी’ केवल एक सामान्य अपराध और उसकी खोज की कहानी मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, अटूट विश्वास और व्यक्ति के आत्मसम्मान का एक जीवंत दस्तावेज है। यह कहानी हमें बहुत बड़ा सबक सिखाती है कि बिना सोचे-समझे और बिना किसी ठोस आधार के किया गया संदेह किसी निर्दोष व्यक्ति के दिल पर कितना गहरा और अमिट घाव दे सकता है।”
प्रो. श्रद्धानंद ने आगे जोड़ा कि आज के आधुनिक संदर्भ में भी यह कहानी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि हमारे समाज का गरीब और कमजोर तबका आज भी इसी तरह के सामाजिक पूर्वाग्रहों का सबसे पहला और आसान शिकार बनता है। यह कहानी पाठक की अंतरात्मा को झकझोरती है और एक संवेदनशील व बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती है।

अमीर वर्ग की संकीर्ण मानसिकता पर चोट करती है ‘चोरी’
विशिष्ट वक्ता श्रीप्रकाश चंद्र श्रीवास्तव ने कहानी की सामाजिक बुनावट पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रेमचंद ने बहुत ही बेबाकी से दिखाया है कि कैसे एक छोटा सा संदेह सीधे तौर पर किसी व्यक्ति के चरित्र और आत्मसम्मान को पूरी तरह चोट पहुँचाता है। कहानी में इस कड़वे सच को भी उजागर किया गया है कि अमीर वर्ग अक्सर अपने घरों में काम करने वाले गरीब या नौकर पेशा लोगों को बिना किसी ठोस सबूत के तुरंत चोर मान लेता है, जो उनकी संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है।
इस अवसर पर सुप्रसिद्ध कवि रामनरेश पाल ने अपनी चुनिंदा रचनाओं का एक बेहतरीन एकल काव्यपाठ प्रस्तुत किया, जिसे श्रोताओं की खूब वाहवाही और तालियां मिलीं।

लगातार जारी रहेगा ‘सुनो मैं प्रेमचंद’ का कारवां- निदेशक राजीव गोंड
प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र ट्रस्ट के निदेशक राजीव गोंड ने कार्यक्रम की सफलता पर हर्ष व्यक्त करते हुए बताया कि “सुनो मैं प्रेमचंद” श्रृंखला के जरिए नई पीढ़ी को प्रेमचंद के विचारों से जोड़ने का यह अनूठा प्रयास आगामी सत्रों में भी निरंतर जारी रहेगा और उनकी अन्य कहानियों पर इसी तरह के संवाद और मंथन आयोजित किए जाते रहेंगे।
इस ऐतिहासिक 1931वें दिवस के अवसर पर मुख्य रूप से टीका राम, अखलाक अहमद, लियाकत अली, अतुल यादव, प्रांजल श्रीवास्तव, संगीत श्रीवास्तव, समीक्षा त्रिपाठी, आलोक शिवाजी, डॉ. मनोहर लाल, मनोज श्रीवास्तव, कुमार महेंद्र, राहुल यादव, रोहित गुप्ता, विपनेश सिंह, संजय श्रीवास्तव, राधेश्याम पासवान सहित भारी संख्या में छात्र और स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का अत्यंत सफल संचालन आयुषी दूबे ने किया। सभी आगंतुकों का स्वागत मनोज विश्वकर्मा ने किया और अंत में रोहित गुप्ता द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया।
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