उत्तर प्रदेशलखनऊ
घुमंतू और जनजातीय समुदाय ज्ञान के समृद्ध कोष, हमें इनसे सीखना होगा : पद्मश्री डॉ. विद्या बिंदु सिंह


भीमराव केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला में सम्मिलित हुए देशभर के अध्येता
लखनऊ फोकस ब्यूरो
लखनऊ (वि.)। जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, भोपाल (म. प्र.) एवं सोसायटी फॉर एण्डेंजर्ड एंड लैसर नोन लैंग्वेजज , लखनऊ (SEL) संस्था के संयुक्त तत्वावधान में घुमंतू भाषा शब्द संचय प्रविधि (द्वितीय शिविर) का आयोजन 20 से 22 दिसंबर, 2024 को बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ (उ. प्र.) में किया जा रहा है, कुलपति डॉ.एसके द्विवेदी, पद्मश्री डॉ.विद्या बिंदु सिंह, निदेशक डॉ धर्मेंद्र पारे,संकायाध्यक्ष डॉ.रामपाल गंगवार,दत्तोपन्त ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ मुकेश मिश्रा,भारतीय हिंदी परिषद के सभापति प्रो. पवन अग्रवाल ,समन्वयक डॉ बलजीत श्रीवास्तव,विशेषज्ञ डॉ.कविता रस्तोगी सहित मंचस्थ अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन के साथ शिविर का शुभारंम किया ।
जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, भोपाल के निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे ने कहा कि अकादमी का उद्देश्य है कि लोक कलाओं को संरक्षित करने के साथ-साथ शोध संबंधी नवीन विषयों को भी ऐसी संगोष्ठियों के माध्यम से सामने लाया जा सके। हमारा प्रयास है कि घुमंतू और विमुक्त समुदायों, जनजातीय समुदायों से संबंधित वाचिक परंपराओं, लोक परंपराओं को आमजन तक सहजता से पहुँचा सकें। अकादमी सतत इस ओर प्रयासरत है। इस संगोष्ठी के उपरांत जो भी शब्द संचय होंगे, अकादमी द्वारा टॉकिंग डिक्शनरी के रूप में उनका प्रकाशन भी किया जाएगा।
विशेषज्ञ प्रो. कविता रस्तोगी ने घुमंतू समुदायों के शब्द संचय प्रविधि और उसकी वर्तमान प्रासंगिकता और अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि यदि उक्त समुदायों की भाषाओं को संरक्षित नहीं किया गया तो यह आगे आने वाली पीढ़ी के लिए दुर्भाग्यूर्ण होगा। इसीलिए हमारे आपके द्वारा की गई यह मेहनत बहुत अमूल्य है। प्रो. गांगवार ने कहा कि घुमंतू समुदायों के साथ संकट यह है कि उनकी भाषा तो है लेकिन व्यापक लिपि नहीं है। साथ ही उनसे संपर्क साधना भी बहुत जटिल होता है। इन जनजातीय समुदायों की वाचिक, सांस्कृतिक और भाषाई संपदा को संरक्षित किया जाना चाहिए। इसीलिए इस संदर्भ में दोनों संस्थाओं द्वारा जो अद्भुत प्रयास किया जा रहा है, वह अकल्पनीय है। भारतीय हिंदी परिषद के सभापति प्रो. पवन अग्रवाल ने कहा कि इस तरह के प्रयास निरंतर होते रहना चाहिए। दत्तोपंत ठेंगड़ी संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा ने कहा कि शब्द हमारे यहाँ ब्रह्म हैं और यही शब्द हमारी संस्कृति को स्वर देते हैं। औपनिवेशिक कालखंड में हमारे सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को दबाया गया और हमें केवल नृजातीय तौर पर प्रस्तुत किया गया। लेकिन हमारी संस्कृति ना तो ऐसी थी, ना है और ना ही ऐसी रहेगी। है। हमारी श्रुति परंपरा, लोक परंपरा और वाचिक परंपरा तक पहुँचने का प्रयास बहुत महत्वपूर्ण हैं। घुमंतू व जनजातीय समुदायों से संबंधित शब्द सामाजिक जीवन दृष्टि को अभिव्यक्त करते हैं। संस्कृति के क्षेत्र में जो सूर्यास्त हो रहा है, उसमें सवेरा होने का वीणा जो आप लोगों ने उठाया है, उसके लिए आप सभी का बहुत आभार। मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. विद्या बिंदु सिंह ने कहा कि ऐसी संगोष्ठियों में कितना कुछ सीखने को मिलता है। इसी भाव से ऐसे सम्मेलन होते रहना चाहिए। टूटते बिखरते समाज को जोड़े रखने के लिए इन घुमंतू और जनजातीय समुदायों से जुड़े रहना और इनसे इनकी परंपराओं को सीखना बहुत आवश्यक है। अपनी संस्कृति के कुटुंब भाव को जोड़े रखने के लिए हमें इनके पास जाना ही चाहिए।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एस. के. द्विवेदी ने कहा कि यह विषय बहुत तार्किक है और इस दिशा में किया जाने वाला आप लोगों को समन्वित प्रयास बहुत सराहनीय है। निश्चय ही यह एक सुंदर परिणाम देने वाला होगा। भाषा वह साधन है जिससे कोई भी अपने विचारों की अभिव्यक्ति स्वतंत्र रूप से और स्पष्टता के साथ कर सकता है। अंत में डॉ बलवीर श्रीवास्तव ने आभार व्यक्त किया।
चौमासा के संत रैदास पर केंद्रित पर अंक का लोकार्पण
इस अवसर पर जनजातीय लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा प्रकाशित चौमासा के संत रैदास पर केंद्रित 126 वें अंक का लोकार्पण किया गया, ज्ञात हो कि चौमासा पत्रिका को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा केयर लिस्ट की सूची में सम्मिलित किया गया है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में बंजारा लोकनृत्य की हुई प्रस्तुति
इस अवसर पर देशमुख दीना पवार ने बंजारा संस्कृति के विविध सांस्कृतिक पक्ष को अवगत करते प्रस्तुति के साथ बंजारा लोक नृत्य की प्रस्तुति दी।




