हुनर का उत्सव: लखनऊ में बच्चों ने नवाचार और विज्ञान से लिखी आत्मसम्मान की कहानी

Lucknow Focus News Desk: लखनऊ के दयाल गेटवे में रविवार को बच्चों के हुनर, शिक्षकों की रचनात्मकता और अभिभावकों के उत्साह का एक शानदार संगम देखने को मिला। मौका था अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित ‘राज्य स्तरीय बाल उत्सव’ का, जहां बच्चों ने अपनी वैज्ञानिक सोच और नेतृत्व क्षमता से सबका दिल जीत लिया।
“प्रगति – आत्मसम्मान से समानता तक” की थीम पर आयोजित इस राज्य स्तरीय बाल उत्सव ने आज शिक्षा को किताबी दुनिया से बाहर निकालकर प्रयोगों की जमीन पर ला खड़ा किया। कार्यक्रम में प्रदेश भर से आए छात्र-छात्राओं और शिक्षकों ने 22 विशेष स्टॉलों के माध्यम से यह दिखाया कि अगर सही मंच मिले, तो हमारे सरकारी स्कूलों के बच्चे किसी से कम नहीं हैं।
कठपुतलियों ने दिया समानता का संदेश
उत्सव को चार प्रमुख जोन में बाँटा गया था। पहले दो जोन शिक्षकों की कलाकारी के नाम रहे। यहाँ शामली से लेकर अयोध्या और मेरठ तक के शिक्षकों ने खुद तैयार की गई टीएलएम (शिक्षण सामग्री) और कठपुतली शो के जरिए जेंडर समानता और बाल अधिकारों जैसे गंभीर विषयों को बड़े ही सरल ढंग से समझाया। बच्चों के लिए ‘खेल-खेल में शिक्षा’ और ‘करके सीखने’ (Learning by Doing) का यह अनुभव बेहद रोमांचक रहा।
बेटियों के बढ़ते कदम और वैज्ञानिक सोच
तीसरे जोन में बच्चों की तार्किक क्षमता पर जोर दिया गया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण संवाद मंच और क्रिएटिव एक्सप्रेशन जैसे स्टॉलों पर बच्चों ने विज्ञान से जुड़े अपने नवाचार पेश किए। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की छात्राओं ने अपनी नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास की कहानियां साझा कीं, जो महिला सशक्तिकरण की एक जीती-जागती तस्वीर पेश कर रही थीं।
चौथे जोन में ध्यान केवल बच्चों पर ही नहीं, बल्कि उनके भविष्य और माता-पिता की भूमिका पर भी था। करियर परामर्श केंद्र पर जहाँ बच्चों को उनके सपनों की दिशा दिखाई गई, वहीं अभिभावक संवाद मंच पर पेरेंट्स को यह समझाया गया कि वे बच्चों के व्यक्तित्व विकास में कैसे भागीदार बन सकते हैं। बाल संसद जैसे स्टॉलों ने बच्चों को लोकतंत्र और नेतृत्व की बारीकियों से रूबरू कराया।
इन जनपदों की रही खास भागीदारी
उत्सव में लखनऊ के अलावा कन्नौज, सीतापुर, रायबरेली, बाराबंकी, लखीमपुर और अमेठी जैसे जनपदों के शिक्षकों व बच्चों के मॉडल्स ने खूब वाहवाही बटोरी। कॉमिक बुक निर्माण और ओरिगामी कला जैसे रचनात्मक केंद्रों पर बच्चों की भीड़ देखते ही बन रही थी।
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