यूपी में ‘सुप्त टीबी’ का बड़ा खतरा, बिना लक्षणों वाले 52% मरीजों में संक्रमण, जांच बेहद जरूरी
राष्ट्रीय सर्वे में हुआ खुलासा- शरीर में निष्क्रिय रहते हैं टीबी के जीवाणु, इम्युनिटी कमजोर होते ही बन सकते हैं सक्रिय मरीज

Lucknow Focus News Desk: उत्तर प्रदेश को तपेदिक (टीबी) मुक्त बनाने के प्रयासों के बीच एक चौंकाने वाला सच सामने आया है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदेश की लगभग आधी आबादी ‘लक्षणविहीन’ या ‘सुप्त टीबी संक्रमण’ (Latent TB Infection) से प्रभावित है। इसका मतलब यह है कि इन लोगों के शरीर में टीबी के जीवाणु निष्क्रिय अवस्था में मौजूद हैं, जो फिलहाल कोई लक्षण पैदा नहीं कर रहे हैं, लेकिन भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा हैं।
हाल ही में देश में हुए राष्ट्रीय टीबी प्रसार सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि बैक्टीरियोलॉजिकल रूप से पॉजिटिव पाए गए टीबी के 52 प्रतिशत मामलों में मरीजों के भीतर कोई भी बाहरी लक्षण नहीं देखा गया। वहीं, 17 प्रतिशत मामले ऐसे थे जिनमें लक्षण होने के बावजूद मरीजों ने इलाज शुरू नहीं कराया था।
सिविल अस्पताल के चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष दूबे ने बताया कि सुप्त टीबी से ग्रसित व्यक्ति को न तो खांसी होती है, न बुखार और न ही वजन घटने जैसी कोई समस्या आती है। ऐसे लोग पूरी तरह सामान्य जीवन जीते हैं और दूसरों में संक्रमण भी नहीं फैलाते। लेकिन, यदि मधुमेह (डायबिटीज), कुपोषण, एचआईवी, कैंसर, धूम्रपान या बढ़ती उम्र के कारण व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) कमजोर होती है, तो यह निष्क्रिय जीवाणु तुरंत ‘सक्रिय टीबी’ में बदल जाता है।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि यदि कोई व्यक्ति किसी सक्रिय टीबी मरीज के लंबे समय तक संपर्क में रहा है, तो उसे नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर जांच करानी चाहिए। डॉक्टर की सलाह पर ‘टीबी प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट’ (TPT) लेकर भविष्य में होने वाले सक्रिय टीबी के खतरे को टाला जा सकता है।
राष्ट्रीय टीबी टास्क फोर्स के वाइस चेयरमैन डॉ. राजेंद्र प्रसाद के अनुसार, टीबी उन्मूलन का लक्ष्य सिर्फ मरीजों का इलाज करना नहीं, बल्कि इस छिपे हुए संक्रमण के प्रति समाज को जागरूक करना भी है। सरकार राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के तहत उच्च जोखिम वाले समूहों और बच्चों की विशेष स्क्रीनिंग कर रही है। हाल ही में चलाए गए 100 दिवसीय विशेष ‘टीबी मुक्त भारत अभियान’ के दौरान ही उत्तर प्रदेश में 53,967 लक्षणविहीन टीबी मरीजों की समय रहते पहचान की गई है, जिससे एक बड़े खतरे को टालने में मदद मिली है।
Also Read: यूपी में ‘ऊर्जा वन अभियान’ से ग्रामीण आत्मनिर्भरता को नई दिशा, 2.81 लाख से अधिक पौधों का रोपण




