उत्तर प्रदेश

सावन में शिव भक्ति की गूंज, शहर के प्राचीन मंदिरों में तैयारियां पूरी, भक्तों के स्वागत को सज गए शिवधाम

Lucknow Focus News Desk: 11 जुलाई से शुरू हो रहे सावन माह को लेकर शहरभर के प्राचीन शिव मंदिरों में रौनक लौट आई है। मंदिरों की सजावट से लेकर भक्तों की सुविधा तक, हर इंतज़ाम को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस पावन महीने में भोलेनाथ के दर्शन और अभिषेक के लिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं, और मंदिरों में “हर-हर महादेव” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

राजेश्वर मंदिर – 900 साल पुराना आस्था का केंद्र

पुजारी रूपेश उपाध्याय बताते हैं कि शहर के प्रतिष्ठित राजेश्वर मंदिर का इतिहास करीब 900 वर्ष पुराना है। जनश्रुति के अनुसार, एक बार खेड़ा के एक सेठ शिवलिंग को बैलगाड़ी में रखकर ले जा रहे थे। रास्ते में एक कुंए के पास विश्राम किया। वहीं उन्हें स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन देकर यही स्थान चुनने को कहा। जब सेठ ने बात को नजरअंदाज़ किया और आगे बढ़ने की कोशिश की, तो बैलगाड़ी हिलना बंद कर गई। इसे प्रभु की इच्छा मानते हुए वहीं शिवलिंग की स्थापना कर दी गई।

कैलाश महादेव मंदिर – परशुराम और जमदग्नि की तपोभूमि

महंत गौरव गिरि के अनुसार, कैलाश महादेव मंदिर यमुना नदी किनारे स्थित है और इसकी उम्र 10,000 वर्षों से भी ज्यादा मानी जाती है। यहां भगवान परशुराम और उनके पिता जमदग्नि द्वारा दो शिवलिंगों की स्थापना की गई थी। मंदिर के पास ही रेणुका धाम भी स्थित है, जहां परशुराम के पिता का आश्रम था। सावन के सोमवार को यहां विशाल मेला भी लगता है।

बिल्वकेश्वर नाथ महादेव मंदिर – बेल वृक्षों से घिरा शिवधाम

अर्चित पांड्या बताते हैं कि सही नाम बिल्वकेश्वर नाथ महादेव मंदिर है, जिसे आमतौर पर बल्केश्वर नाथ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर करीब 700 साल पुराना है। मान्यता है कि बेल के जंगलों के बीच बेल वृक्ष की जड़ से स्वयं शिवलिंग प्रकट हुए थे। ऐसा माना जाता है कि मंदिर में 40 बार दर्शन करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है।

पृथ्वीनाथ महादेव – द्वापर युग की धरोहर

पुजारी अजय राजौरिया बताते हैं कि इस मंदिर का संबंध द्वापर युग से है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण जहां-जहां गए, वहां शिवजी ने दर्शन किए। इसी क्रम में यह मंदिर भी धरती की खुदाई से निकला था। कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान ने युद्ध के बाद यहां विश्राम किया था, तभी से इसे पृथ्वीनाथ कहा जाने लगा।

मनकामेश्वर महादेव – जहां भगवान शिव ने मांगी थी एक झलक

महंत योगेश पुरी बताते हैं कि यह मंदिर उस स्थान पर स्थित है, जहां भगवान शिव बालकृष्ण के दर्शन की इच्छा लेकर पहुंचे थे। यहीं उनकी ‘मनोकामना’ पूरी हुई थी, इसलिए यहां भोलेनाथ को मनकामेश्वर कहा जाता है।

रावली महादेव – जिसे अंग्रेज भी नहीं हिला सके

रावली महादेव मंदिर भी अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। अंग्रेजों ने जब रेलवे लाइन बिछानी चाही, तो मंदिर को हटाने का प्रयास किया, लेकिन नाकाम रहे। अंत में रेलवे लाइन को ही शिफ्ट करना पड़ा।

घर में भी कर सकते हैं शिव पूजन

कैलाश मंदिर के महंत के मुताबिक, सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। भक्त यदि मंदिर न आ सकें तो वे घर पर भी नर्मदा के शिवलिंग, चिकनी मिट्टी, या आटे से बने शिवलिंग की विधिपूर्वक स्थापना कर जल, दूध, बेलपत्र आदि चढ़ाकर पूजा कर सकते हैं। भोलेनाथ को केवल श्रद्धा से ही प्रसन्न किया जा सकता है।

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