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बहुत विराट था अन्नू भैय्या का व्यक्तित्व

डॉ. चंद्र गोपाल पांडेय

जाते सब हैं, जाना सबको है लेकिन आनन्द सिंह उर्फ अन्नू भैय्या का जाना गोण्डा की राजनीति के एक युग का अवसान है। अब उनका विराट व्यक्तित्व व कृतित्व स्मृतियों में रहेगा।

विरासत में मिली राजनीति को अन्नू भइया ने न केवल सलीके से संजोया अपितु उनके मानदंडों में वृद्धि की 50 वर्षों से अधिक के सार्वजनिक जीवन में अन्नू भैय्या कभी विवादित नहीं रहे । आपराधिक छवि के लोगों से कोसों दूर रहकर थाना, तहसील के निचले स्तर की राजनीति से भी परहेज किया।

पिता राजा राघवेंद्र प्रताप सिंह, जो मनकापुर से विधायक थे, के मृत्योपरांत (1965) रिक्त विधानसभा सीट से अपना विधायी कैरियर शुरू करने वाले अन्नू भैय्या अंतिम चुनाव भी गौरा विधानसभा से 2012 में सपा से लड़े और अखिलेश यादव के मंत्रिमंडल में कृषि मंत्री बने । वे चौधरी चरण सिंह की सरकार में भी कृषि मंत्री थे । सन् 2014 में पुत्र कीर्ति वर्धन सिंह के भाजपा में शामिल होने से उत्पन्न राजनीतिक परिस्थिति में उन्होंने अखिलेश मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद कोई चुनाव नहीं लड़ा। गोंडा की राजनीति में मनकापुर राजघराने के दबदबे काही प्रभाव था कि देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अन्नू भैया और उनके परिवार की पुरानी पार्टी कांग्रेस में पुनर्वापसी करायी। वे 1971 में सांसद बनने तक लगातार विधायक रहे।

अन्नू भैया की लोकप्रियता और राजनैतिक कद की असल परीक्षा 1971 के गोण्डा लोकसभा चुनाव में कसौटी पर थी। उनके सगे चाचा कुंवर देवेंद्र प्रताप सिंह उर्फ लल्लन साहब इंदिरा कांग्रेस के प्रत्याशी थे। अन्नू भैय्या उनके सामने सिंडीकेट कांग्रेस की ओर से प्रत्याशी बने। जिले में कांग्रेस के विभाजन की नींव पहले से पड़ गयी थी । राजनैतिक समीक्षक व पत्रकार डॉ. जगदेव सिंह ने ‘गोण्डा : अतीत तथा वर्तमान’ में उल्लेख किया है कि 14 जनवरी, 1970 को अविभाजित गोण्डा जिले में श्रीमती इंदिरा गांधी आई थीं और इसी के बाद कांग्रेस के एक गुट ने नवरंग सिंह की अगुवाई में इंदिरा जी का नेतृत्व स्वीकार कर लिया। कांग्रेसियों के दूसरे गुट ने स्थानीय स्तर पर आनन्द सिंह को अपना नेता माना। इसलिये 1971 का लोकसभा चुनाव आनन्द सिंह के लिये बहुत महत्वपूर्ण था। उन्होंने सीधी टक्कर में न केवल चाचा को पराजित किया बल्कि सन्देश दिया कि कांग्रेस (संगठन) पर उनकी पकड़ है और ‘लोक’ उनके साथ है।

बाद में इंदिरा गांधी ने प्रदेश से सिंडिकेट कांग्रेस के एकमात्र सांसद आनंद सिंह की कांग्रेस (आई) में वापसी की। अन्नू भइया 1977 का चुनाव जनता पार्टी के प्रत्याशी सत्यदेव सिंह से हार गए। 1980 में कांग्रेस की वापसी के साथ ही आनन्द सिंह लगातार सातवीं, आठवीं व नौंवी लोकसभा के सदस्य रहे । सत्तर व अस्सी के दशक में उनका राजनैतिक कौशल बुलंदी पर था। गोण्डा में कांग्रेस के एकछत्र निर्विवाद नेता रहे है। जिले के कई नेताओं को विधानसभा व लोकसभा तक भेजने का श्रेय उन्हें जाता है।

कहा तो यह जाता था कि विधानसभा के एक दो विधानसभा को छोड़कर उन्होंने जिसे चाहा, उसे कांग्रेस का सिम्बल दिया गया। मुजेहना सीट का उदाहरण ले लें। 1974 के विधान सभा चुनाव में एक मठ के महन्त दीप नारायण वन को कांग्रेस का टिकट दिला दिया। वे विधायक बन गए। उन्हें 1977 व 1980 में भी टिकट दिलाया। 1984 में बलरामपुर के कई स्थानीय दिग्गजों को अलग-थलग करके इन्हीं वन बाबा को लोकसभा का टिकट दिलवाकर चुनाव जितवाने में मदद की। 1985 व 1989 के विधानसभा चुनाव में मुजेहना से जिले के एक वरिष्ठ वकील बाबू रामपाल सिंह को चुनाव लड़ाया । वे दोनों बार जीते भी। लेकिन 1989 के चुनाव में वन बाकी अन्नू भैया के प्रति निष्ठा जवाब दे गई। वह चाहते थे कि उनके परिवार का कोई चुनाव लड़े, लेकिन राजा साहब को यह स्वीकार नहीं था । वन बाबा ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस प्रत्याशी रामपाल सिंह के विरुद्ध अपने परिवार की महिला दुर्गेश्वरी को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में उतार दिया। वन बाबा उन्हें चुनाव नहीं जिता सके और राजा साहब के प्रति निष्ठा भी खो दी। इसके बाद दीप नारायन वन राजनैतिक बनवास में चले। यह बात अलग है कि उनके पुत्र विनय कुमार द्विवेदी, आनंद सिंह के पुत्र सम्प्रति विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह के राजनीतिक हमसफर हुए और दूसरी बार भाजपा के टिकट पर मेहनौन से विधायक हैं। यही हाल तीन बार के विधायक रामपाल सिंह का भी हुआ। मनकापुर राजघराने से निष्ठा खत्म होते ही उनका भी राजनीतिक वनवास शुरू हुआ और वह चुनाव नहीं जीते। अन्नू भैया राजनीतिक निष्ठा से ऊपर व्यक्तिगत निष्ठा को अधिक महत्व देते थे। यही वजह थी कि कर्नलगंज में एक स्वर्णकार के यहां मुनीमी कर रहे मुरलीधर द्विवेदी ‘मुनीम’ को कटरा से टिकट दिलाया और चुनाव जितवाया। गोण्डा की राजनीति में इस तरह की कई मिसालें हैं। मनकापुर (सु.) सीट से छेदी लाल व राम विशुन आजाद को इसी तरह स्थापित किया लेकिन सिर के ऊपर से राजघराने का हाथ हटने के बाद वे भी विधायक नहीं बन सके। अन्नू भैया की एक खासियत यह भी थी कि यदि उनका विरोधी निष्ठा के साथ उनसे जुड़ना चाहे तो वह स्वीकार करने में देर नहीं लगाते थे। पूर्व मंत्री रमापति शास्त्री लगातार डिक्सिर व बलरामपुर विधानसभा चुनाव हारकर हाशिये पर चले गए थे। राजघराने का विश्वास अर्जित करते ही वहाँ से लगातार दूसरी बार विधायक हैं। उनकी पार्टी के प्रति वफ़ादारी असंदिग्ध थी। 1971 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद विधायक पद से त्यागपत्र दिए और वहां से विधानसभा का प्रत्याशी परिवार से बाहर निकल कर ढूंढा और यह अवसर कर्मठ कार्यकर्ता देवेंद्र नाथ मिश्र को दिया। 1989 का चुनाव देश की राजनीति के लिए खास था। अन्नू भैय्या के समधी वीपी सिंह बोफोर्स मुद्दे को लेकर कांग्रेस से अलग हो गए। उन्हें पूरे देश में ख़ासकर उत्तर प्रदेश में छत्रप जैसे नेताओं की तलाश थी लेकिन आनन्द सिंह उनके साथ नहीं गए। इस तरह उनकी अटूट निष्ठा कांग्रेस के प्रति बनी रही और कांग्रेस की उनके प्रति ।

1989 के लोकसभा चुनाव में उनकी कई चुनाव सभाओं को मैंने कवर किया था। अन्नू भइया खांटी अवधी में अपनी बात रखते थे। विपक्षी प्रत्याशी या उसके पार्टी नेता के बारे में मुंह नहीं खोलते थे। वे बहुत ही संस्कारनिष्ठ थे। अरगा झील में मत्स्यविकास पर शोध के सिलसिले में ‘अमृत प्रभात’ के लिए एक खबर की थी । सही-सही विषयवस्तु याद नहीं है । शायद कुछ कंटेंट अन्नू भैय्या की कार्यशैली पर आलोचनात्मक रहा होगा । तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र अन्नू भैया के आमंत्रण पर वॉलीबॉल टूर्नामेंट के उद्घाटन के बहाने मनकापुर स्थित कोठी पर गए थे। वहां कुछ पत्रकार व विधायक अल्पाहार पर आमंत्रित थे। चलते समय अपने को अन्नू भैया का करीबी प्रचारित करने वाले एक पत्रकार मुझे उनके पास अलग ले गए और परिचय दिया कि यह डॉ. पाण्डेय हैं, इन्होंने ही अरगा झील पर खबर की थी, अब इनको समझा दिया है। इस पर राजा मनकापुर का कहना था कि आप तो कुछ लिखते नहीं है और जो लिखता है उसे मना करते हो। यह था आलोचना को भी

स्वीकार करने का उनका विराट व्यक्तित्व। गोण्डा की कौन कहे आसपास के जिलों के सभी पार्टियों के नेताओं, साधु-संतों, शिक्षकों, किसानों, नौजवानों, हर किसी ने उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होकर उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित की।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं ।)

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