प्रकृति में गजानन: जब वृक्षों की छाल पर जीवंत हुए गणपति; छायाकार पुनीत कात्यायन की ‘दिव्य’ दृष्टि

Lucknow Focus News Desk: कला और आध्यात्मिकता के अद्भुत संगम के रूप में राजधानी लखनऊ में ‘गजानन’ छायाचित्र प्रदर्शनी का सफल आयोजन हुआ। कला स्रोत आर्ट गैलरी में आयोजित इस प्रदर्शनी में जाने-माने छायाकार पुनीत कात्यायन ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से प्रकृति में स्वतः निर्मित भगवान गणेश के 38 विविध स्वरूपों को दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत किया। यह प्रदर्शनी सिद्ध करती है कि यदि दृष्टि में संवेदना हो, तो प्रकृति का कण-कण एक जीवित मंदिर बन जाता है।
बारीक दृष्टि और तकनीकी कुशलता का संगम
इस प्रदर्शनी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि पुनीत कात्यायन ने ये सभी दृश्य मूल रूप से केवल 2 से 3 इंच के छोटे फ्रेम में क्लिक किए थे। प्रदर्शनी के लिए जब इन्हें बड़े आकार में प्रस्तुत किया गया, तो उनकी तकनीकी कुशलता और विवरणों (Details) की बारीकी ने कला-प्रेमियों को चकित कर दिया। बिना किसी कृत्रिम हस्तक्षेप के, उन्होंने वृक्षों के तनों और छालों में छुपे उन आकृतियों को खोजा जो सहज ही ‘प्रथम पूज्य’ देव गजानन का आभास कराती हैं।
दिग्गजों ने किया कला का अभिनंदन
प्रदर्शनी का उद्घाटन पद्मश्री अनिल रस्तोगी, वरिष्ठ कलाकार जय कृष्ण अग्रवाल, अनिल रिसाल सिंह, अमित टंगारी और रजनीश रावत द्वारा किया गया। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में नगर के प्रतिष्ठित कलाकारों, छात्रों और कला-प्रेमियों की भारी भीड़ उमड़ी। वरिष्ठ छायाकार अनिल रिसाल सिंह ने पुनीत के कार्य की सराहना करते हुए कहा कि फोटोग्राफी केवल तकनीक नहीं, बल्कि कल्पना और नवाचार का विज्ञान है।
कटे और घायल वृक्षों में खोजी दिव्यता
पुनीत कात्यायन, जो वर्तमान में एमिटी विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, की कला-दृष्टि पर्यावरण और अध्यात्म के अंतर्संबंधों पर केंद्रित है। उनकी चर्चित ‘ट्री बार्क सीरीज़’ केवल सुंदर छवियाँ नहीं हैं, बल्कि प्रकृति के दोहन और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में एक संवेदनशील प्रतिक्रिया हैं। वे जले, कटे और घायल वृक्षों में भी सृजन की शक्ति देखते हैं। कहीं सिंदूरी आभा में गणपति का ललाट दिखता है, तो कहीं जड़ों के घुमाव में उनकी सूंड का आभास होता है।
एक दशक की साधना का परिणाम
15 वर्षों से अधिक का रचनात्मक अनुभव रखने वाले पुनीत ने विज्ञापन एजेंसियों में लंबे समय तक आर्ट डायरेक्टर के रूप में कार्य किया है। उनकी यह ‘गजानन’ शृंखला दर्शक को भीतर तक प्रभावित करती है। यह प्रदर्शनी हमें याद दिलाती है कि विनाश के मध्य भी सृजन शेष है और प्रकृति सदैव हमें अपनी दिव्यता का संकेत देती रहती है।




